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पैसों का लालच और धर्म परिवर्तन का आरोप: बॉम्बे हाईकोर्ट ने केस रद्द कर चार आरोपी को किया रिहा, क्या है मामला?
Tue, 13 Oct 2026 01:40 PM IST
प्रशांत तिवारी
एएनआई, मुंबई
एएनआई, मुंबई
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Tue, 13 Oct 2026 01:40 PM IST
सार
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने कहा कि किसी दंपती पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने का आरोप अपने आप में धार्मिक भावनाएं आहत करने का अपराध साबित नहीं करता। अदालत ने महाराष्ट्र में संबंधित कानून लागू होने से पहले वर्ष 2025 में हुई कथित घटना के मामले में चार लोगों के खिलाफ एफआईआर और चार्जशीट रद्द कर दी।
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बॉम्बे हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति पर धर्म परिवर्तन के लिए जोर देना अपने आप में किसी धर्म या धार्मिक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के बराबर नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने एक दंपती पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाने के आरोप में चार लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और दाखिल चार्जशीट रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि आरोपियों की कार्रवाई को अधिक से अधिक अपने धर्म का प्रचार करने और दंपती पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उन्होंने किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई।
पैसे, बच्चों की पढ़ाई और घर बनवाने का दिया था प्रस्ताव
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपियों ने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी से कहा था कि अगर वे हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लेते हैं, तो उन्हें हर महीने पैसे दिए जाएंगे। इतना ही नहीं, उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार के लिए घर बनवाने का भी भरोसा दिया गया था। आरोप था कि इस तरह दंपती पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाया गया।
धर्म का प्रचार करना धार्मिक भावनाएं आहत करना नहीं
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों से यह साबित नहीं होता कि उन्होंने किसी वर्ग के लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से काम किया। अदालत के मुताबिक, आरोपियों पर अधिकतम यही आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। लेकिन केवल इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान किया है।
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धार्मिक भावनाएं आहत करने का इरादा नहीं था
मामले में आरोपियों ने अदालत के सामने दलील दी कि उनका मकसद किसी धर्म का अपमान करना या देश के किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने कहा कि उन पर लगाए गए आरोपों से धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने का अपराध साबित नहीं होता। अदालत ने मामले के तथ्यों और आरोपों पर विचार करने के बाद उनकी दलीलों को ध्यान में रखा।
घटना के समय महाराष्ट्र में ऐसा कानून लागू नहीं था
अदालत ने इस मामले में एक अहम कानूनी पहलू पर भी गौर किया। कथित घटना वर्ष 2025 की है। उस समय महाराष्ट्र में प्रलोभन देकर एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन कराने पर रोक लगाने वाला कानून लागू नहीं था। अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र में धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा और एक धर्म से दूसरे धर्म में गैरकानूनी धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया गया, जो 28 अगस्त 2026 से लागू हुआ। चूंकि इस मामले में आरोपित घटना कानून लागू होने से पहले की है, इसलिए बाद में लागू हुए कानून को उस घटना पर लागू नहीं किया जा सकता।
अमरावती के चार लोगों को मिली राहत
हाईकोर्ट ने जिन चार लोगों के खिलाफ कार्रवाई रद्द की, उनमें वरिष्ठ नागरिक जोसेफ खुड़ावंत, उनके बेटे विक्टर खुड़ावंत, बहू एल्विना खुड़ावंत और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर शामिल हैं। चारों अमरावती के रहने वाले हैं। उनके खिलाफ जनवरी में अमरावती में एफआईआर दर्ज की गई थी और बाद में पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की थी। आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और चार्जशीट, दोनों को रद्द करने की मांग की थी।
ये भी पढ़ें: ‘तिरंगा फहराना गुनाह है क्या’?: सीजेपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर भड़के दिपके, बोले- और उग्र होगा आंदोलन
धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में दर्ज था मामला
चारों आरोपियों के खिलाफ किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण काम करने तथा उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने से जुड़े आरोप लगाए गए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में सामने आए आरोप इन अपराधों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसी आधार पर अदालत ने चारों आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट रद्द कर दी।
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पैसे, बच्चों की पढ़ाई और घर बनवाने का दिया था प्रस्ताव
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपियों ने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी से कहा था कि अगर वे हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लेते हैं, तो उन्हें हर महीने पैसे दिए जाएंगे। इतना ही नहीं, उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार के लिए घर बनवाने का भी भरोसा दिया गया था। आरोप था कि इस तरह दंपती पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाया गया।
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धर्म का प्रचार करना धार्मिक भावनाएं आहत करना नहीं
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों से यह साबित नहीं होता कि उन्होंने किसी वर्ग के लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से काम किया। अदालत के मुताबिक, आरोपियों पर अधिकतम यही आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। लेकिन केवल इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान किया है।
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धार्मिक भावनाएं आहत करने का इरादा नहीं था
मामले में आरोपियों ने अदालत के सामने दलील दी कि उनका मकसद किसी धर्म का अपमान करना या देश के किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने कहा कि उन पर लगाए गए आरोपों से धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने का अपराध साबित नहीं होता। अदालत ने मामले के तथ्यों और आरोपों पर विचार करने के बाद उनकी दलीलों को ध्यान में रखा।
घटना के समय महाराष्ट्र में ऐसा कानून लागू नहीं था
अदालत ने इस मामले में एक अहम कानूनी पहलू पर भी गौर किया। कथित घटना वर्ष 2025 की है। उस समय महाराष्ट्र में प्रलोभन देकर एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन कराने पर रोक लगाने वाला कानून लागू नहीं था। अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र में धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा और एक धर्म से दूसरे धर्म में गैरकानूनी धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया गया, जो 28 अगस्त 2026 से लागू हुआ। चूंकि इस मामले में आरोपित घटना कानून लागू होने से पहले की है, इसलिए बाद में लागू हुए कानून को उस घटना पर लागू नहीं किया जा सकता।
अमरावती के चार लोगों को मिली राहत
हाईकोर्ट ने जिन चार लोगों के खिलाफ कार्रवाई रद्द की, उनमें वरिष्ठ नागरिक जोसेफ खुड़ावंत, उनके बेटे विक्टर खुड़ावंत, बहू एल्विना खुड़ावंत और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर शामिल हैं। चारों अमरावती के रहने वाले हैं। उनके खिलाफ जनवरी में अमरावती में एफआईआर दर्ज की गई थी और बाद में पुलिस ने चार्जशीट भी दाखिल की थी। आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और चार्जशीट, दोनों को रद्द करने की मांग की थी।
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धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में दर्ज था मामला
चारों आरोपियों के खिलाफ किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण काम करने तथा उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने से जुड़े आरोप लगाए गए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में सामने आए आरोप इन अपराधों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसी आधार पर अदालत ने चारों आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट रद्द कर दी।