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अर्नब गोस्वामी के छूटने पर वकीलों ने कहा- जमानत की सर्वमान्य व्याख्या करे सुप्रीम कोर्ट

Wed, 11 Nov 2020 08:09 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 11 Nov 2020 08:09 PM IST
सार

आभा सिंह ने कहा कि अर्नब गोस्वामी के मामले में बंबई हाईकोर्ट की टिप्पणी पूरी तरह कानूनसम्मत थी। जस्टिस एसएस शिंदे की कोर्ट ने उनसे कहा था कि जमानत के लिए उन्हें सबसे पहले सेशन कोर्ट में अपील करनी चाहिए...

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After the release of Arnab Goswami, the senior lawyers said,  Supreme Court should define the bail
supreme court - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

अर्नब गोस्वामी मामले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्चता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि केवल वैचारिक मतभिन्नता के कारण अगर हमारी राज्य सरकारें ऐसा करने जा रही हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना होगा। उच्च न्यायालयों को ऐसे मामलों में अपने अधिकारों का उपयोग करना चाहिए। वहीं, अर्नब गोस्वामी को अंतरिम जमानत मिलने के बाद वरिष्ठ वकीलों ने कहा है कि जमानत मिलने के मामले में इसकी सर्वमान्य व्याख्या होनी चाहिए क्योंकि अलग-अलग जगहों पर इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।

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वरिष्ठ वकील आभा सिंह ने अमर उजाला से कहा कि अनेक राज्य सरकारें केवल वैचारिक मतभिन्नता के कारण लोगों को जेल में डाल देती हैं और वर्षों तक उन्हेंं जमानत नहीं मिलती। कई लोगों को केवल एक भाषण देने, ट्वीट करने या किसी विचारधारा से जुड़ा साहित्य रख लेने के नाम पर जेल में डाल दिया जाता है। ऐसे मामलों में जमानत की सर्वमान्य व्याख्या न होने के कारण लोगों को जमानत नहीं मिलती। कानून के दुरुपयोग से बचने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को जमानत देने के सर्वमान्य आधारों की व्याख्या करनी चाहिए।

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आभा सिंह ने कहा कि अर्नब गोस्वामी के मामले में बंबई हाईकोर्ट की टिप्पणी पूरी तरह कानूनसम्मत थी। जस्टिस एसएस शिंदे की कोर्ट ने उनसे कहा था कि जमानत के लिए उन्हें सबसे पहले सेशन कोर्ट में अपील करनी चाहिए। अगर हर व्यक्ति जमानत-अंतरिम जमानत के लिए सीधे हाईकोर्ट या सर्वोच्च अदालत में अपील करना शुरू कर देगा, तो एक दृष्टि से यह निचली अदालतों के कार्य क्षेत्र को कम करने जैसा होगा।
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वरिष्ठ वकील अश्विनी कुुमार दुबे ने कहा कि अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी बिल्कुल कानून का उल्लंघन थी। सेशन कोर्ट ने भी यह बात कह दी थी और इसके बाद ही अर्नब गोस्वामी को तत्काल जमानत मिल जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि सीआरपीसी की धारा 173 (8) के अनुसार पुलिस को किसी भी केस में रि-इन्वेस्टीगेशन करने का अधिकार नहीं है। अर्नब गोस्वामी के मामले की तरह अगर किसी मामले में अंतिम रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के सामने पेश की जा चुकी है और कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया है तो कोर्ट की अनुमति के बिना उस मामले में आगे जांच नहीं हो सकती। जांच के लिए अदालत का आदेश मिलना अनिवार्य होता है।


अश्विनी कुुमार दुबे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सिर्फ वैचारिक मतभेद के आधार पर किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता। लेकिन यह देखने में आ रहा है कि बिना किसी उचित आधार के राज्य सरकारें लोगों की स्वतंत्रता बाधित कर रही हैं। ऐसे में सबकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए जमानत के आधारों की स्पष्ट व्याख्या होनी चाहिए। 

 

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