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Supreme Court: 25 साल जेल में रहने के बाद दोषी को सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग पाया, रिहा किया
Wed, 08 Jan 2025 10:57 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 08 Jan 2025 10:57 PM IST
सार
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी 25 साल की कैद के बाद रिहा कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने पाया कि घटना के समय दोषी किशोर था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों ने दस्तावेज की अनदेखी करके अन्याय किया है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के देहरादून जिले में 1994 में एक सेवानिवृत्त कर्नल, उनके बेटे और बहन की हत्या के दोषी को 25 साल की कैद के बाद रिहा करने का आदेश दिया और पाया कि घटना के समय वह 14 साल का किशोर था। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने बुधवार को कहा, हर स्तर पर अदालतों ने दस्तावेज की अनदेखी करके अन्याय किया है।
यह देखते हुए कि न्यायालय की ओर की गई गलती किसी व्यक्ति के उचित लाभ के आड़े नहीं आ सकती, पीठ ने उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत उसकी सजा को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, न्याय सत्य की अभिव्यक्ति के अलावा और कुछ नहीं है। यह सत्य है जो हर किसी भी कार्य से परे है। न्यायालय का प्राथमिक कर्तव्य तथ्यों के नीचे छिपे सत्य को उजागर करने के लिए प्रयास करना है। इस प्रकार, न्यायालय सत्य की खोज करने वाला इंजन है, जिसके उपकरण प्रक्रियात्मक और मूल कानून हैं।
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता ने अशिक्षित होने के बावजूद ट्रायल कोर्ट से लेकर इस न्यायालय के समक्ष क्यूरेटिव (सुधारात्मक) याचिका के निष्कर्ष तक किसी न किसी तरह से यह दलील उठाई। पीठ ने कहा, मुकदमेबाजी के पहले दौर में न्यायालयों के दृष्टिकोण को कानून की नजर में बरकरार नहीं रखा जा सकता।
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इस मामले में अपीलकर्ता को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी और उसकी समीक्षा और क्यूरेटिव याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। हालांकि 8 मई, 2012 को जारी राष्ट्रपति के आदेश के तहत, मृत्युदंड को इस शर्त के साथ आजीवन कारावास में बदल दिया गया था कि उसे 60 वर्ष की आयु प्राप्त होने तक रिहा नहीं किया जाएगा ।
किसी चरण में नाबालिग होने की दलील पर गौर नहीं किया गया
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उसके वकील एस मुरलीधर ने तर्क दिया था कि हर चरण में उठाई गई नाबालिग होने की दलील पर गौर नहीं किया गया जो उसके साथ घोर अन्याय है। उसे पहले के एकांत कारावास सहित अनुचित रूप से कारावास में रखा गया है, जो स्पष्ट रूप से अवैध है। जलपाईगुड़ी से प्राप्त स्कूल प्रमाण पत्र का हवाला देते हुए वकील ने जेल में बिताए गए उसके प्रारंभिक वर्षों के नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजे के साथ उसकी तत्काल रिहाई की मांग की थी।
उसने जो समय खोया वह कभी वापस नहीं आ सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम केवल यह कहेंगे कि यह एक ऐसा मामला है जहां अपीलकर्ता अदालतों द्वारा की गई गलती के कारण पीड़ित है। हमें सूचित किया गया है कि जेल में उसका आचरण सामान्य है, कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं है। उसने समाज में फिर से घुलने-मिलने का अवसर खो दिया। उसने जो समय खोया है, वह कभी वापस नहीं आ सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश राष्ट्रपति के आदेश की समीक्षा नहीं है बल्कि यह 2015 के अधिनियम के प्रावधानों का लाभ किसी योग्य व्यक्ति को देने का मामला है।
मुकदमे के अंतिम रूप ले चुके होने की बात नहीं मानी
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज और वंशजा शुक्ला ने कहा कि यह एक ऐसे मुद्दे को फिर से खोलने और फिर से सुनने का प्रयास है जो अंतिम रूप ले चुका है। हालांकि, अदालत ने कहा कि कानून के तहत परिकल्पित प्रक्रियात्मक आदेश का भी ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा पालन नहीं किया गया क्योंकि किशोर होने की दलील किसी भी स्तर पर और कार्यवाही के समापन के बाद भी उठाई जा सकती है।
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण करे पुनर्वास
न्यायालय ने उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को राज्य या केंद्र सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना की पहचान करने, उसके पुनर्वास और रिहाई के बाद समाज में उसके सुचारू रूप से पुनः एकीकरण में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह बच्चे को अपराधी के रूप में नहीं, बल्कि पीड़ित के रूप में मानकर उसके माता-पिता की भूमिका निभाए। कोर्ट को इसे सुधार, पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण के नजरिये से देखना चाहिए।
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यह देखते हुए कि न्यायालय की ओर की गई गलती किसी व्यक्ति के उचित लाभ के आड़े नहीं आ सकती, पीठ ने उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत उसकी सजा को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, न्याय सत्य की अभिव्यक्ति के अलावा और कुछ नहीं है। यह सत्य है जो हर किसी भी कार्य से परे है। न्यायालय का प्राथमिक कर्तव्य तथ्यों के नीचे छिपे सत्य को उजागर करने के लिए प्रयास करना है। इस प्रकार, न्यायालय सत्य की खोज करने वाला इंजन है, जिसके उपकरण प्रक्रियात्मक और मूल कानून हैं।
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पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता ने अशिक्षित होने के बावजूद ट्रायल कोर्ट से लेकर इस न्यायालय के समक्ष क्यूरेटिव (सुधारात्मक) याचिका के निष्कर्ष तक किसी न किसी तरह से यह दलील उठाई। पीठ ने कहा, मुकदमेबाजी के पहले दौर में न्यायालयों के दृष्टिकोण को कानून की नजर में बरकरार नहीं रखा जा सकता।
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इस मामले में अपीलकर्ता को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी और उसकी समीक्षा और क्यूरेटिव याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। हालांकि 8 मई, 2012 को जारी राष्ट्रपति के आदेश के तहत, मृत्युदंड को इस शर्त के साथ आजीवन कारावास में बदल दिया गया था कि उसे 60 वर्ष की आयु प्राप्त होने तक रिहा नहीं किया जाएगा ।
किसी चरण में नाबालिग होने की दलील पर गौर नहीं किया गया
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उसके वकील एस मुरलीधर ने तर्क दिया था कि हर चरण में उठाई गई नाबालिग होने की दलील पर गौर नहीं किया गया जो उसके साथ घोर अन्याय है। उसे पहले के एकांत कारावास सहित अनुचित रूप से कारावास में रखा गया है, जो स्पष्ट रूप से अवैध है। जलपाईगुड़ी से प्राप्त स्कूल प्रमाण पत्र का हवाला देते हुए वकील ने जेल में बिताए गए उसके प्रारंभिक वर्षों के नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजे के साथ उसकी तत्काल रिहाई की मांग की थी।
उसने जो समय खोया वह कभी वापस नहीं आ सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम केवल यह कहेंगे कि यह एक ऐसा मामला है जहां अपीलकर्ता अदालतों द्वारा की गई गलती के कारण पीड़ित है। हमें सूचित किया गया है कि जेल में उसका आचरण सामान्य है, कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं है। उसने समाज में फिर से घुलने-मिलने का अवसर खो दिया। उसने जो समय खोया है, वह कभी वापस नहीं आ सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश राष्ट्रपति के आदेश की समीक्षा नहीं है बल्कि यह 2015 के अधिनियम के प्रावधानों का लाभ किसी योग्य व्यक्ति को देने का मामला है।
मुकदमे के अंतिम रूप ले चुके होने की बात नहीं मानी
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज और वंशजा शुक्ला ने कहा कि यह एक ऐसे मुद्दे को फिर से खोलने और फिर से सुनने का प्रयास है जो अंतिम रूप ले चुका है। हालांकि, अदालत ने कहा कि कानून के तहत परिकल्पित प्रक्रियात्मक आदेश का भी ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा पालन नहीं किया गया क्योंकि किशोर होने की दलील किसी भी स्तर पर और कार्यवाही के समापन के बाद भी उठाई जा सकती है।
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण करे पुनर्वास
न्यायालय ने उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को राज्य या केंद्र सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना की पहचान करने, उसके पुनर्वास और रिहाई के बाद समाज में उसके सुचारू रूप से पुनः एकीकरण में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह बच्चे को अपराधी के रूप में नहीं, बल्कि पीड़ित के रूप में मानकर उसके माता-पिता की भूमिका निभाए। कोर्ट को इसे सुधार, पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण के नजरिये से देखना चाहिए।