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8 Years of Modi Govt.: सरकार के आठ सालों पर आठ सवाल, इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे पीएम नरेंद्र मोदी?

Tue, 31 May 2022 04:24 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 31 May 2022 04:24 PM IST
सार

अर्थशास्त्र के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि जब किसी देश की आंतरिक स्थिति अशांत होती है, तो विदेशी निवेशकों में अपने निवेश के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा होती है। वे नया निवेश करने से बचते हैं और शेयर बाजार में लगाया हुआ पैसा भी वापस निकालना शुरू कर देते हैं...

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8 Years of Modi Govt: Prime Minister Narendra Modi completed eight years in power, during these years government has achieved great success on many important fronts
पीएम मोदी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आठ साल पूरे हो गए हैं। इन आठ सालों में केंद्र सरकार ने कई अहम मोर्चों पर बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। पीएम मोदी के हर कार्य में ‘एक नया इतिहास लिखने’ की सोच साफ देखी गई है। उनकी यह सोच गरीब लोगों को राशन देने, महिलाओं को सशक्त करने, एकता स्मारक-राष्ट्रीय स्मारक बनाने और देश को पांच ट्रिलियन डॉलर (तकरीबन 375 लाख करोड़) की अर्थव्यवस्था बनाने के सपने देखने से लेकर सफाई और शौचालय जैसे सामान्य कार्यों में भी दिखती रही है, जिसने इन बेहद साधारण से दिखने वाले कार्यों को भी असाधारण बना दिया।

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केंद्र की तमाम उपलब्धियों के बीच पीएम मोदी के इसी कार्यकाल में देश में कई गंभीर चुनौतियां भी पैदा हुई हैं। इन्हें हल किए बिना देश उस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता, जिसका सपना पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी तक देखते रहे हैं। इन मुद्दों में आठ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं जिनका हल केंद्र सरकार को निकालना चाहिए, जिससे देश सही दिशा में आगे बढ़ सके...  

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1- सांप्रदायिकता का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में जब देश की सत्ता संभाली थी, तब देश के पास कुल 322.6 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा रिजर्व था। आज यह बढ़कर लगभग दो गुना (597.51 बिलियन डॉलर) हो चुका है। यह देश की मजबूत अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजार पर गहराते विश्वास का प्रमाण भी है। विदेशी निवेशक किसी देश में तभी निवेश करते हैं, जब उन्हें भरोसा होता है कि उनका पैसा सुरक्षित रहेगा और उन्हें एक बेहतर लाभ मिलेगा।

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अर्थशास्त्र के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि जब किसी देश की आंतरिक स्थिति अशांत होती है, तो विदेशी निवेशकों में अपने निवेश के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा होती है। वे नया निवेश करने से बचते हैं और शेयर बाजार में लगाया हुआ पैसा भी वापस निकालना शुरू कर देते हैं। इससे बाजार में घबराहट पैदा हो सकती है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था के गहरे संकट में फंसने का खतरा पैदा हो जाता है। भारत इस तरह की स्थिति में न फंसे, इसके लिए प्रयास करना चाहिए कि विभिन्न समाजों के बीच टकराव की स्थिति न बने। केंद्र-राज्यों को इसके लिए विशेष प्रयास करना चाहिए।

2- जो पसंद नहीं करते, उनसे भी संवाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की लोकप्रियता हाल के वर्षों में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है, लेकिन इसके बाद भी भाजपा का मत प्रतिशत 40-42 फीसदी के आसपास ही है। इसका अर्थ है कि देश के शेष लगभग 60 फीसदी लोग आज भी भाजपा को एक विकल्प के रूप में नहीं देखते। जबकि देश को आगे बढ़ाने के लिए देश के हर व्यक्ति की भागीदारी और उसका विश्वास सुनिश्चित होना चाहिए। केंद्र को यह प्रयास करना होगा कि उसके कार्यों में देश का हर व्यक्ति भागीदार बने। सबका विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए।

3- अमीर-गरीब के बीच असमानता बढ़ी

पीएम मोदी के केंद्र की सत्ता में आठ साल पूरे होने के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि सरकार ने इस दौरान 80 करोड़ गरीब परिवारों को राशन उपलब्ध कराया है, आठ सालों के दौरान 50 करोड़ परिवारों को आयुष्मान योजना के अंतर्गत मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। लेकिन इन आंकड़ों का दूसरा अर्थ यह भी है कि देश की लगभग दो तिहाई आबादी राशन और स्वास्थ्य सुविधा के लिए आज भी अपने स्तर पर सक्षम नहीं है। इसके लिए उसे केंद्र या राज्य की ओर मुंह देखना पड़ता है।

हालिया जारी आंकड़े बताते हैं कि कोरोना काल के दौरान गरीबों की आय में बहुत कमी आई है, तो देश में अमीरों की संख्या में तेज वृद्धि हुई है। निचले स्तर की कारों की बिक्री में कमी आई है तो लक्जरी कारों की बिक्री में तेज उछाल आया है। ये आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि देश में असमानता बढ़ रही है। सरकार को इसे कम करने का प्रय़ास करना चाहिए क्योंकि बेलगाम असमानता देश को अस्थिर कर सकती है।

4- बेरोजगारी

केंद्र का दावा है कि उसने मूलभूत ढांचे में निवेश बढाया है, सड़कों का निर्माण तेज गति से हो रहा है और निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन देश में लगातार बेरोजगारी बढ़ रही है। इस समय भी देश में बेरोजगारी का राष्ट्रीय आंकड़ा 7.1 फीसदी है। शहरों में बेरोजगारी 8.2 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 6.6 फीसदी है। भारत जैसे विशाल देश में बेरोजगारी का यह बड़ा आंकड़ा है। केंद्र को इससे पार पाना होगा। इसके लिए मूलभूत ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा।   

5- भविष्य के प्रति बढ़ रही अनिश्चितता

सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार कम की जा रही है। अब तक सेना और रेल में नौकरी के बेहतर अवसर हुआ करते थे, लेकिन अब इनमें अवसरों में कमी की जा रही है। अब हर जगह ठेके पर निजीकरण के जरिए कामकाज कराने को हर सरकार ने अपनी प्राथमिकता बना लिया है। लेकिन सरकारी नौकरी भविष्य के प्रति लोगों को आश्वस्त करती है, जिससे वे अपने लिए बेहतर निवेश योजनाएं बनाकर देश के विकास में सहयोग देते हैं, जबकि प्राइवेट सेक्टर में अच्छी सेलरी के बाद भी अनिश्चितता लोगों को निराशा के दौर में धकेलती है। इसका समाज पर नकारात्मक असर पड़ता है।

डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, पूरी तरह बाजारवाद के सहारे आ चुके देशों अमेरिका और जापान में ऊंची आय दर के बावजूद लोगों में छाई अनिश्चितता उन्हें निराशा, अवसाद और आत्महत्ता के जाल में फंसा रही है। इससे देश के खुशहाली इंडेक्स में गिरावट आती है और लोगों में जीवन के प्रति निराशा बढ़ती है। यह स्थिति किसी भी देश को आगे बढ़ने से रोकती है। देश को इन परिस्थितियों में जाने से रोकने के लिए केंद्र को बेहतर नौकरियों के सृजन और हर व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

6- महंगाई

अच्छी विकास दर होने के बाद भी आवश्यक वस्तुओं, घरेलू उपभोग की चीजों और निर्माण उद्योग की चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इससे महंगाई बढ़ रही है और लोगों की खरीद क्षमता घट रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय घरों में आवश्यक उपभोग की मात्रा के बराबर दाल, दूध, मांस और अंडे की खपत में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसका असर बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। केंद्र को महंगाई पर नियंत्रण रख कर इन कारकों पर विराम लगाना चाहिए।   

7- स्वास्थ्य-प्रदूषण

केंद्र सरकार ने देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा मजबूत करने के लिए कई अहम कार्य किए हैं। 15 नए एम्स की स्थापना, हर एक-दो जिले के बीच एक बड़े अस्पताल का निर्माण शुरू कर देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने में अहम कार्य किया है। एमबीबीएस डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के लिए भी बेहतर बदलाव किए गए हैं। आयुष्मान योजना से 50 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने की बात कही गई है। लेकिन उच्च स्तर की बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देना अभी भी देश के लिए एक बड़ी समस्या है। इससे निपटने के लिए बड़े बदलाव किए जाने की अपेक्षा है।  

स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रदूषण से सीधा संबंध होता है। जब तक देश में जीवन जीने के लिए साफ हवा, साफ पानी और सुरक्षित आवास नहीं मिल जाता, सबको बेहतर स्वास्थ्य देने का सपना अधूरा ही रह जाता है। बीमार लोग न केवल स्वयं परेशान होते हैं, बल्कि उनके कारण देश की उत्पादकता भी प्रभावित होती है। पीएम मोदी ने ‘हर घर, टोंटी से जल’ देने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। शौचालयों के निर्माण से भी महिलाओं-बच्चों को जलजनित रोगों से मुक्त रखने में मदद मिली है। लेकिन सबको स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है।

नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत देश को न केवल ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकते हैं, बल्कि यह वायु प्रदूषण को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। भारत अभी भी अपनी जरूरतों का केवल 10 फीसदी ऊर्जा ही नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त करता है। जबकि ई-वाहन और बिजली चालित वाहनों को लोकप्रिय बनाने में अभी भी कई बड़ी बाधाएं हैं। इससे निपटने की कोशिश की जानी चाहिए। केंद्र को नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत बढ़ाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

8- चीन से चुनौती संभव

प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत के संबंध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुए हैं। आज अमेरिका, रूस और यूरोपीय देश भी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए, दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए भारत की तरफ देख रहे हैं। यह भारत की बड़ी सफलता है। लेकिन सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि चीन भारत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। अपनी आंतरिक चुनौतियों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए वह निकट भविष्य में भारत पर आक्रमण तक कर सकता है। डोकलाम में उसकी कार्रवाई को इसी तरह की भड़कावे वाली कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। चीन जैसे सशक्त देश से निपटने के लिए भारत को सामरिक युद्ध सामग्री के निर्माण के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से भी निपटना होगा।

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