1991 का वो चुनाव जो 'मंडल-मंदिर' पर लड़ा गया और सत्ता में आई कांग्रेस
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साल 1989 में हुए आम चुनाव के 16 महीने बाद ही नौवीं लोकसभा भंग कर दी गई। देश 10वें आम चुनाव के मुहाने पर था जो कि मध्यावधि चुनाव था। यह 1991 का वह दौर था जब देश में मंडल और मंदिर का माहौल गर्म था। राम जन्मभूमि, बाबरी मस्जिद और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के विरोध में यह चुनाव लड़ा जा रहा था। देश में गठबंधन की अस्थिर राजनीति का आगाज हो चुका था। 1984 में राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार पांच साल बाद ही 1989 में विपक्ष में थी।
21 महीने में ही देश ने दो प्रधानमंत्रियों को देख लिया था। पहली सरकार भाजपा और लेफ्ट के संयुक्त पार्टी को बाहरी समर्थन से बनी थी। जिसने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया था। दूसरी सरकार जनता दल का विभाजन कर बनी थी। चंद्रशेखर ने 143 में से 61 सांसदों के साथ जनता दल का विभाजन किया और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। बाद में राजीव गांधी की जासूसी के आरोप में चंद्रशेखर को इस्तीफा देना पड़ा था। इस तरह 1991 का आम चुनाव विपरित परिस्थियों का 'मंडल-मंदिर' चुनाव था।
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वीपी सिंह सरकार के मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद देश में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। सामान्य जातियों के छात्र देशभर में प्रदर्शन कर रहे थे। सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) को 27 फीसदी आरक्षण का सड़कों पर विरोध हो रहा था और हिंसा की स्थिति थी। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी राम मंदिर के मुद्दे पर चुनाव मैदान में थी। यह पूरा दौर ही धार्मिक ध्रुवीकरण का दौर था। 1991 में तीन चरणों- 20 मई, 12 जून और 15 जून को चुनाव हुए। कांग्रेस, भाजपा और राष्ट्रीय मोर्चा- जनता दल (एस)- वामपंथियों मोर्चे के गठबंधन के बीच त्रिशंकु मुकाबला था।
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21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की वोटिंग के पहले दौर के ठीक एक दिन बाद हत्या कर दी गई। एलटीटीआई ने तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या की गई। इसके बाद जून के मध्य तक चुनाव को स्थगित कर दिया गया। पंजाब में लोकसभा चुनाव बाद में कराए गए। जबकि जम्मू-कश्मीर में आम चुनाव हुए ही नहीं। उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन थे जो बेहद कड़क हुआ करते थे। 15 दिन चुनाव टालने के बाद 12 जून और 15 जून को दूसरे और तीसरे चरण का मतदान हुआ।
57 फीसदी वोट पड़े। कांग्रेस को सबसे ज्यादा 232 सीटें मिलीं। भारतीय जनता पार्टी 120 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। जनता दल को सिर्फ 59 सीटें मिलीं। 21 जून 1991 को कांग्रेस के पी.वी. नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
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9 राष्ट्रीय और 136 क्षेत्रीय पार्टियों ने लड़ा 1991 चुनाव
राम मंदिर मुद्दे की वजह से 1991 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की सीटें बढ़ीं। भाजपा ने 120 सीटें जीतीं। यूपी में 51 सीटें जीतीं और गुजरात में पार्टी के खाते में 20 सीटें आई। इस चुनाव में 9 राष्ट्रीय और 136 क्षेत्रीय पार्टियों ने भाग लिया। कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में काफी अच्छा प्रदर्शन किया।
1991 का लोकसभा चुनाव
कुल सीटें- 543
कांग्रेस- 232 सीटें
भाजपा- 120 सीटें
जनता दल- 59 सीटें
सीपीएम- 35 सीटें
सीपीआई- 14 सीटें
तेलगु देशम पार्टी- 13 सीटें
एआईएडीएमके- 11 सीटें
जनता पार्टी- 5 सीटें