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67 साल पहले हुआ था आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव, 53 पार्टियां उतरी थीं मैदान में

Sat, 23 Feb 2019 12:03 PM IST
ललित फुलारा ललित फुलारा, अमर उजाला
ललित फुलारा, अमर उजाला Published by: ललित फुलारा Updated Sat, 23 Feb 2019 12:03 PM IST
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The Interesting Story of Indias first general election in 1952
आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव अक्टूबर 1951 से लेकर फरवरी 1952 के बीच हुआ था।

भारत 17वें लोकसभा चुनाव के लिए तैयार है। बीते 67 साल में देश में लोकतंत्र की जड़ें गहरे तक समा गई हैं। चुनाव दर चुनाव भारत का मतदाता और चुनावी तंत्र परिपक्व हुआ है। इस सबकी शुरुआत हुई 1951-52 के उन चुनावों से, जिन्होंने इतिहास रचा और देश में उस परंपरा की नींव रखी, जिसमें जनता ही सबसे ऊपर है। चलिए, पहले आम चुनाव के दिलचस्प सफर पर जब हर भारतीय के स्वप्न रंगीन थे लेकिन जमाना श्वेत-श्याम।

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आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव अक्टूबर 1951 से लेकर फरवरी 1952 के बीच हुआ था। पांच महीनों तक चले चुनाव में उस वक्त सड़क पर गाड़ी के साथ ही बैलगाड़ी भी मौजूद थी। पुराने कांग्रेसी नई पार्टी बनाकर कांग्रेस के खिलाफ उतर रहे थे तो वामपंथी सशस्त्र संग्राम छोड़कर लोकतंत्र में मत की ताकत के आगे झुक चले थे। कांग्रेस के दिग्गज नेता कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी में जा चुके थे। वहीं, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू मंत्रिमंडल से अलग होकर भारतीय जनसंघ की स्थापना कर ली थी। 

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489 सीटों पर लड़ा गया था पहला लोकसभा चुनाव

The Interesting Story of Indias first general election in 1952
पहला लोकसभा चुनाव 489 सीटों पर लड़ा गया था। कांग्रेस समेत 53 पार्टियां मैदान में थीं।

पहला लोकसभा चुनाव 489 सीटों पर लड़ा गया था। कांग्रेस के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, भारतीय बोल्शेविक पार्टी, जमींदार पार्टी समेत 53 पार्टियां मैदान में थीं। 38 सीटों पर 47 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव में कुल 1874 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे। इनमें कई पुराने दिग्गज कांग्रेसी भी थे जो पार्टी से छिटक कर अपनी-अपनी पार्टियां बना चुके थे।

दरअसल, आजादी के बाद  प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल का गठन किया। मंत्रिमंडल में 15 सदस्यों को चुना गया जो समाज के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले थे। इसी में शामिल श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से अलग होकर भारतीय जनसंघ की स्थापना की तो वहीं संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने अनुसूचित जाति फेडरेशन की स्थापना की। बाद में यह रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया कहलाई।

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चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) ने 364 सीटें जीतीं।

कांग्रेस के ही दूसरे दिग्गज नेताओं में से जेबी कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी का गठन किया, तो वहीं राम मनोहर लोहिया और जेपी नारायण ने सोशलिस्ट पार्टी की नींव रखी। तेलंगाना में सशस्त्र संघर्ष को त्यागकर वामपंथियों ने पहले लोकसभा चुनाव में 49 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि बोल्शेविक पार्टी और जमींदार पार्टी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। 

जब आया पहले लोकसभा चुनाव का नतीजा

भारत के पहले लोकसभा चुनाव के नतीजे जब सामने आए तो कांग्रेस ने कुल मतों में से 45 फीसदी मत हासिल किए और पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। 17.3 करोड़ मतदाताओं में से करीब 45 फीसदी ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) ने 364 सीटें जीतीं।

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सिर्फ दो पार्टियां ही छू पाईं थीं दहाई का आंकड़ा

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भारत के पहले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के खाते में सिर्फ 3 ही सीटें आईं।

इस चुनाव की सबसे खास बात रही कि इसमें शामिल सभी पार्टियों में से कांग्रेस के अलावा सिर्फ दो ही पार्टी दहाई आंकड़ा छू सकीं। ये दो पार्टियां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव में 16 सीटें अपने नाम कीं जबकि सोशलिस्ट पार्टी के खाते में 12 सीटें गईं।

3 सीटों पर ही सिमट गया भारतीय जनसंघ

भारत के पहले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के खाते में सिर्फ 3 ही सीटें आईं। कांग्रेस के बाद निर्दलियों ने सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। चुनाव में संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को हार का सामना करना पड़ा। उनकी आरक्षित सीट बॉम्बे से कांग्रेस के नारायण सदोबा कजरोलकर जीतकर आए। जहां कांग्रेस के बाद निर्दलियों ने सबसे ज्यादा सीटें जीती तो वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस चुनाव में 16 सीटें जीतने में कामयाब रही। लेकिन पार्टी का वोट प्रतिशत बेहद कम रहा। सीपीआई को 3.29 फीसदी वोट ही मिले। जबकि इस मामले में उनसे कम सीट जीतने वाली सोशलिस्ट पार्टी भाग्यशाली रही। सोशलिस्ट पार्टी के खाते में जहां 12 सीटें आई तो वहीं उनका वोट प्रतिशत वामपंथी पार्टी से ज्यादा रहा।

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