Report: '17 राज्यों के 265 जिलों की 14000 से ज्यादा बच्चियों को बालिका वधू बनने से रोका गया', रिपोर्ट में दावा
रिपोर्ट में अदालतों में लंबित बाल विवाह के मामलों को निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश की गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि अगर बाल विवाह के मामले में माता-पिता, अभिभावक और पंचायत की भागीदारी सामने आती है तो बलात्कार के बराबर अपराध मानते हुए सजा दोगुनी होनी चाहिए। साथ ही बाल विवाह पीडि़तों के पुनर्वास के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं।
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देश में बाल विवाह पर अब लगाम लगने लगी है। लोग बाल विवाह रोकने के प्रति जागरूक होने लगे हैं। हाल ही में एक एनजीओ की रिपोर्ट में सामने आया है कि साल 2023-24 में देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 256 जिलों में लोगों ने 14 हजार और ग्राम पंचायतों ने 59 हजार बेटियों को बालिका वधू बनने से रोका। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग द्वारा जारी की गई भारतीय बाल संरक्षण अनुसंधान टीम की रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में बाल विवाह के लिए ग्राम पंचायतों को जिम्मेदार ठहराया था। इसके बाद इस बार अक्षय तृतीया पर बाल विवाह के मामलों में खासी गिरावट आई।
रिपोर्ट में कहा गया कि देश में 2023-24 में 161 नागरिक सामाजिक संगठनों ने कानूनी रूप से 14137 बाल विवाह रोके। जबकि ग्राम पंचायतों की मदद से 59364 बाल विवाह पर रोक लगाई गई। वहीं देश में पांच साल में प्रतिदिन दर्ज होने वाले बाल विवाह की संख्या 4442 से गिरकर 3863 रह गई। खास बात यह है कि 2022 में हर जिले में बाल विवाह का केवल एक ही केस अभियोजन के लिए दर्ज किया गया।
इसके अलावा देश में शादी और यौन शोषण के लिए बेटियों के अपहरण और उनकी बरामदगी के मामले भी सुधरे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 2022 में 63513 बच्चों को अपहरण शादी और यौन शोषण के लिए किया गया था। इनमें से 25 फीसदी कुल 15748 बच्चों को बरामद किया गया। रिपोर्ट में सामने आया कि 2022 में बरामद हुए 15142 बच्चों का अपहरण शादी के लिए किया गया था। हालांकि 2022 में शादी के लिए नाबालिग लड़कियों के अपहरण के मामलों में इजाफा हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 में 11236 बालिकाओं का अपहरण किया गया था, मगर 2022 में यह आंकड़ा 24 फीसदी बढ़कर 13981 पर पहुंच गया।
असम में किया गया था सर्वे, यहां बाल विवाह के मामलों में बड़ी गिरावट
भारतीय बाल संरक्षण अनुसंधान टीम ने असम के 20 जिलों के 1132 गांवों के बाल विवाह को लेकर सर्वे किया था। इस दौरान टीम ने कुल 21 लाख लोगों और आठ लाख बच्चों से बात की। रिपोर्ट में सामने आया कि असम में 2021-22 से 2023-24 के बीच बाल विवाह के मामलों में 81 फीसदी की कमी आई है। यहां बाल विवाह की संख्या 3225 से घटकर 627 रह गई। सर्वे में यह भी बात सामने आया कि 30 फीसदी गांवों में बाल विवाह पूरी तरह समाप्त हो गया। जबकि 40 फीसदी गांवों में बाल विवाह के मामलों में बड़ी कमी आई। लोगों ने माना कि असम सरकार द्वारा बाल विवाह रोकने के लिए बनाए गए कानून का बड़ा प्रभाव पड़ा है। इसके बाद बाल विवाह के मामलों में आरोपियों को गिरफ्तारी और रिपोर्ट दर्ज होने से लोग बाल विवाह रोकने के प्रति जागरूक हुए।
अदालत में 181 मामलों की ही सुनवाई, यह चिंता की बात: रिपोर्ट
रिपोर्ट में बाल विवाह के मामलों की कोर्ट में सुनवाई में देरी पर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया कि 2022 में 3563 मामलों की कोर्ट में सुनवाई होनी थी, लेकिन 181 मामलों में ही सुनवाई हो सकी। कोर्ट में कुल 92 फीसदी मामले लंबित हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि जिस हिसाब से मामले निपट रहे उस हिसाब से 2022 तक लंबित मामलों की सुनवाई में 19 साल लग सकते हैं। वहीं इन मामलों में सजा भी कम हुई। रिपोर्ट के अनुसार 2022 में बाल विवाह के केवल 11 फीसदी मामलों में सजा हो सकी।
फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की जरूरत
रिपोर्ट में अदालतों में लंबित बाल विवाह के मामलों को निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश की गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि अगर बाल विवाह के मामले में माता-पिता, अभिभावक और पंचायत की भागीदारी सामने आती है तो बलात्कार के बराबर अपराध मानते हुए सजा दोगुनी होनी चाहिए। साथ ही बाल विवाह पीडि़तों के पुनर्वास के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं। इसके अलावा बाल विवाह छोड़ने वाली महिलाओं के कौशल विकास और आर्थिक मदद के लिए विशेष योजना शुरू की जाए। साथ ही बाल विवाह की सूचना देने के लिए रैपिड एक्शन रिस्पांस टीम के साथ केंद्रीय पोर्टल बनाया जाए।