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ने का प्रसंग सुन श्रद्धालुओं की आंखें हुई नम
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राधा कृष्ण मंदिर कोटला कलां में चल रहे समागम में कथा सुनते श्रद्धालु।
- फोटो : Una
ऊना/संतोषगढ़। श्री राधाकृष्ण मंदिर कोटला कलां में चल रहे 13 दिवसीय धार्मिक महोत्सव के पांचवें दिन शनिवार को कथावाचक गौर दास महाराज ने भक्त माल कथा में वर्णित नरसी मेहता की बेटी नानीबाई की बेटी सुलोचना के विवाह संबंधी प्रसंग सुनाया। इस दौरान प्रसंग सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गई।
कथावाचक गौर दास ने प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि अपने भक्त नरसी की बेटी नानी बाई की बेटी सुलोचना की शादी का भात भगवान श्रीकृष्ण ने कैसे भरा। प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि नरसी बहुत गरीब थे, लेकिन कृष्ण भक्त थे।
उनके एक बेटा था। इसका नाम सांवलदास था, जो भगवान को प्यारा हो गया था। नरसी की बेटी नानी बाई की बेटी सुलोचना बाई का विवाह तय हुआ। नानी बाई ने (भात भरने) विवाह की रस्म के लिए नरसी को बुलाया। नरसी के पास भात भरने के लिए कुछ नहीं था। वह निर्धन थे। मगर भगवान की भक्ति का खजाना भरपूर था। गौर दास ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब नरसी के पास भात भरने का संदेश आया। वह ससुरालियों आवभगत सही तरीके से नहीं कर पाए।
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ससुरालियों ने इसकी शिकायत भी की। गरीबी का हवाला देकर नरसी भगत रो पड़े और भगवान श्रीकृष्ण को याद करने लगे। तब अपने भगत की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण से रहा नहीं गया। भगवान श्रीकृष्ण अपनी अर्द्धांगिनी सत्यभामा, रूकमणी और अपने भगत नरसी के साथ उनकी बेटी नानी बाई के घर भात भरने पहुंच गए।
भगवान श्री कृष्ण द्वारिका से अपनी रानियों को लेकर जूनागढ़ पहुंचे और दिखाया कि भगवान अपने भक्तों का भाव किस तरह रखते हैं। भगवान ने सवा प्रहर यानि बारह घंटे स्वर्ण की मुहरे बरसाई और नानी का भात भरा।
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कथावाचक गौर दास ने प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि अपने भक्त नरसी की बेटी नानी बाई की बेटी सुलोचना की शादी का भात भगवान श्रीकृष्ण ने कैसे भरा। प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि नरसी बहुत गरीब थे, लेकिन कृष्ण भक्त थे।
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उनके एक बेटा था। इसका नाम सांवलदास था, जो भगवान को प्यारा हो गया था। नरसी की बेटी नानी बाई की बेटी सुलोचना बाई का विवाह तय हुआ। नानी बाई ने (भात भरने) विवाह की रस्म के लिए नरसी को बुलाया। नरसी के पास भात भरने के लिए कुछ नहीं था। वह निर्धन थे। मगर भगवान की भक्ति का खजाना भरपूर था। गौर दास ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब नरसी के पास भात भरने का संदेश आया। वह ससुरालियों आवभगत सही तरीके से नहीं कर पाए।
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ससुरालियों ने इसकी शिकायत भी की। गरीबी का हवाला देकर नरसी भगत रो पड़े और भगवान श्रीकृष्ण को याद करने लगे। तब अपने भगत की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण से रहा नहीं गया। भगवान श्रीकृष्ण अपनी अर्द्धांगिनी सत्यभामा, रूकमणी और अपने भगत नरसी के साथ उनकी बेटी नानी बाई के घर भात भरने पहुंच गए।
भगवान श्री कृष्ण द्वारिका से अपनी रानियों को लेकर जूनागढ़ पहुंचे और दिखाया कि भगवान अपने भक्तों का भाव किस तरह रखते हैं। भगवान ने सवा प्रहर यानि बारह घंटे स्वर्ण की मुहरे बरसाई और नानी का भात भरा।