{"_id":"6acfcf0e0d5274099e0749f6","slug":"old-verdict-in-land-dispute-set-aside-rehearing-to-be-held-una-news-c-93-1-una1002-209737-2026-10-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Una News: जमीन विवाद में पुराना फैसला रद्द, दोबारा होगी सुनवाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Una News: जमीन विवाद में पुराना फैसला रद्द, दोबारा होगी सुनवाई
Thu, 15 Oct 2026 12:20 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Thu, 15 Oct 2026 12:20 AM IST
विज्ञापन
दुलैहड़ (ऊना)। जमीन के मालिकाना हक से जुड़े पुराने विवाद में ऊना की अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-प्रथम की अदालत ने निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया है। अदालत ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेजते हुए मृत पक्षकार के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर शामिल करने और सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी गई है।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-प्रथम की अदालत ने 14 अक्तूबर को सुनाए फैसले में 18 अक्तूबर 2017 को वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, कोर्ट नंबर-1 ऊना की ओर से सुनाए गए फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। मामले में सभी पक्षकारों को 5 नवंबर 2026 को निचली अदालत में पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले के अनुसार, वादी ने वर्ष 2006 में जमीन को संयुक्त हिंदू परिवार की सहदायिकी संपत्ति घोषित करने और उसमें अपना हिस्सा दिलाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। इसके साथ ही जमीन पर स्थायी निषेधाज्ञा देने या वैकल्पिक रूप से संयुक्त कब्जा दिलाने की मांग की गई थी। वादी ने 15 जनवरी 1981 को कथित रूप से निष्पादित वसीयत और उसके आधार पर दर्ज इंतकालों की वैधता को भी चुनौती दी थी। प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि जमीन स्वयं अर्जित या अलग संपत्ति थी और वसीयत के माध्यम से इसे संबंधित पक्षों के पक्ष में दिया गया था। प्रतिवादी पक्ष ने यह भी दलील दी थी कि इसी संपत्ति और वसीयत को लेकर पहले भी मुकदमेबाजी हो चुकी है और मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। वर्ष 2017 में निचली अदालत ने वादी का मुकदमा खारिज कर दिया था। अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया कि एक प्रतिवादी की मृत्यु 1 अक्तूबर 2016 को हो गई थी, जबकि निचली अदालत ने 18 अक्तूबर 2017 को फैसला सुनाया। मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिसों को निचली अदालत में रिकॉर्ड पर शामिल नहीं किया गया था। अपीलकर्ता की ओर से मृत्यु प्रमाणपत्र पेश कर फैसले को रद्द करने और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेजने की मांग की गई।
विज्ञापन
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने मृत्यु प्रमाणपत्र और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि संबंधित पक्षकार की मृत्यु फैसले से पहले हो गई थी और उनके कानूनी वारिस रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए थे। अदालत ने इसी आधार पर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए निचली अदालत में भेज दिया।
आदेश के अनुसार, निचली अदालत मृत पक्षकार के कानूनी वारिसों को नियमानुसार रिकॉर्ड पर शामिल करेगी। इसके बाद सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाएगा।
विज्ञापन
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-प्रथम की अदालत ने 14 अक्तूबर को सुनाए फैसले में 18 अक्तूबर 2017 को वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, कोर्ट नंबर-1 ऊना की ओर से सुनाए गए फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। मामले में सभी पक्षकारों को 5 नवंबर 2026 को निचली अदालत में पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।
विज्ञापन
मामले के अनुसार, वादी ने वर्ष 2006 में जमीन को संयुक्त हिंदू परिवार की सहदायिकी संपत्ति घोषित करने और उसमें अपना हिस्सा दिलाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। इसके साथ ही जमीन पर स्थायी निषेधाज्ञा देने या वैकल्पिक रूप से संयुक्त कब्जा दिलाने की मांग की गई थी। वादी ने 15 जनवरी 1981 को कथित रूप से निष्पादित वसीयत और उसके आधार पर दर्ज इंतकालों की वैधता को भी चुनौती दी थी। प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि जमीन स्वयं अर्जित या अलग संपत्ति थी और वसीयत के माध्यम से इसे संबंधित पक्षों के पक्ष में दिया गया था। प्रतिवादी पक्ष ने यह भी दलील दी थी कि इसी संपत्ति और वसीयत को लेकर पहले भी मुकदमेबाजी हो चुकी है और मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। वर्ष 2017 में निचली अदालत ने वादी का मुकदमा खारिज कर दिया था। अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया कि एक प्रतिवादी की मृत्यु 1 अक्तूबर 2016 को हो गई थी, जबकि निचली अदालत ने 18 अक्तूबर 2017 को फैसला सुनाया। मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिसों को निचली अदालत में रिकॉर्ड पर शामिल नहीं किया गया था। अपीलकर्ता की ओर से मृत्यु प्रमाणपत्र पेश कर फैसले को रद्द करने और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेजने की मांग की गई।
विज्ञापन
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने मृत्यु प्रमाणपत्र और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि संबंधित पक्षकार की मृत्यु फैसले से पहले हो गई थी और उनके कानूनी वारिस रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए थे। अदालत ने इसी आधार पर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए निचली अदालत में भेज दिया।
आदेश के अनुसार, निचली अदालत मृत पक्षकार के कानूनी वारिसों को नियमानुसार रिकॉर्ड पर शामिल करेगी। इसके बाद सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाएगा।