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अध्ययन में खुलासा: स्पीति के लोग कम पी रहे पानी, मांस का सेवन ज्यादा, बढ़े पथरी के मामले

Sat, 04 Jul 2026 10:32 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 04 Jul 2026 10:32 AM IST
सार

 प्रदेश की उच्च हिमालयी जनजातीय क्षेत्र स्पीति घाटी में पित्ताशय की पथरी के मामलों में अधिकता ने गंगा बेसिन, कश्मीर को पीछे छोड़ दिया है। 

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Study reveals: People in Spiti are drinking less water and consuming more meat, leading to a rise in cases of
स्पीति का गांव । - फोटो : संवाद

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की उच्च हिमालयी जनजातीय क्षेत्र स्पीति घाटी में पित्ताशय की पथरी के मामलों में अधिकता ने गंगा बेसिन, कश्मीर को पीछे छोड़ दिया है। घाटी के लोगों की ओर से कम पानी पीने, मांस का सेवन समेत पर्यावरणीय कारणों से गॉलस्टोन यानी पित्ताशय की पथरी के मामले बढ़ गए हैं। अगर समय पर उपचार न करवाया जाए तो कैंसर का कारण भी बन सकता है। वहीं, अध्ययन में खुलासा हुआ है कि घाटी में जांचे गए लोगों में 21.3 फीसदी में पित्ताशय में पथरी पाई गई है जबकि गंगा बेसिन में 4.15 फीसदी और कश्मीर में 6.12 फीसदी लोगों में पित्ताशय की पथरी पाई गई है। दूसरी ओर घाटी के मध्यम ऊंचाई 3,501 से 4,000 मीटर वाले काजा व धनकर क्षेत्र में सबसे अधिक लोग गॉलस्टोन से पीड़ित हैं।

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हैरत की बात तो ये है कि दुर्गम क्षेत्र में हर पांचवें वयस्क में इस प्रकार की पथरी मिली है। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के सर्जरी विभाग के चिकित्सकों ने हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के साथ मिलकर दुर्गम क्षेत्र स्पीति घाटी में पित्ताशय में पथरी का अध्ययन किया। यह अध्ययन 2024-2026 तक चिकित्सकों ने किया है। इसमें 30 से 70 वर्ष आयु वर्ष के लोगों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान 450 निवासियों की स्क्रीनिंग की गई। स्क्रीनिंग के लिए ऊंचाई के आधार पर बांटा गया, ताकि पित्ताशय की पथरी रोग की पहचान की जा सके। इस दौरान उपवास की स्थिति में सभी के अल्ट्रासाउंड किए गए और जानकारी ली गई। इसमें निम्न ऊंचाई समूह ताबो में 24 फीसदी, मध्यम ऊंचाई समूह काजा और धनकर 24.7 फीसदी और उच्च ऊंचाई समूह हिक्किम और कोमिक में 15.3 फीसदी लोगों के पित्ताशय में पथरी पाई गई।

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ऐसे लग सकता है पता

पित्ताशय की पथरी का कई कारणों से पता लग सकता है। इसमें तीव्र पित्ताशय सूजन, पैंक्रियाटाइटिस, अवरोधक पीलिया और बार-बार होने वाले पित्त संबंधी लक्षण जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। इन क्षेत्रों में पित्ताशय का कैंसर सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता है, वहां पित्ताशय की पथरी की जांच करवाना जरूरी हो जाता है।

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इस पर ध्यान देना जरूरी

अगर उपहिमालयी और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पित्ताशय की पथरी का जल्द पता लगाना है तो शीघ्र पहचान के लिए अल्ट्रासाउंड सुविधा, रेफरल व्यवस्था और हेपेटो-बिलियरी शल्य चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना होगा। अध्ययन टीम ने डॉ. विपन कुमार, डॉ. सुषमा मखैक, डॉ. संदीप राजटा, डॉ. विप्र शर्मा, डॉ. दिग्विजय ठाकुर, डॉ. चमन ठाकुर और डॉ. सुधाकर शामिल थे।

जनसंख्या पर आधारित पहला अध्ययन

हिमाचल प्रदेश में जनसंख्या के आधार पर पित्ताशय की पथरी का पहला अध्ययन है। इससे पहले अस्पताल आधारित अध्ययनों या स्वयं बताई गई बीमारी के आंकड़ों के आधार पर अध्ययन किया जाता था। वहीं, पीजीआई की ओर से बाहरी राज्यों के दुर्गम क्षेत्रों में अध्ययन किया है। इस अध्ययन के दौरान दुर्गम क्षेत्रों में चिकित्सीय टीम ने अल्ट्रासाउंड मशीन तक को पहुंचाया है। मौके पर ही लोगों की जांच की गई है। फील्ड स्क्रीनिंग हिक्किम और कोमिक जैसे गांवों में भी की गई।

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