अध्ययन में बड़ा खुलासा: हिमाचल में हर दस साल में बढ़ रहे सूखे के चार दिन, जल सुरक्षा-कृषि पर पड़ सकता है असर
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में वर्षा और सूखे की प्रवृत्तियों के तुलनात्मक अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक पाई गई है। वर्ष 1981 से 2020 तक के आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार हिमाचल प्रदेश में लगातार सूखे के दिनों की अवधि बढ़ रही है।
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पश्चिमी हिमालय में सूखे की स्थिति गंभीर होने के संकेत मिल रहे हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में वर्षा और सूखे की प्रवृत्तियों के तुलनात्मक अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक पाई गई है। वर्ष 1981 से 2020 तक के आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार हिमाचल प्रदेश में लगातार सूखे के दिनों की अवधि बढ़ रही है। वहीं, जम्मू-कश्मीर में वर्षा की मात्रा, बारिश की तीव्रता और मध्यम से भारी वर्षा वाले दिनों की संख्या में गिरावट पाई गई। उत्तराखंड में वर्षा के सूचकांकों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं मिला। यह अध्ययन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान से जुड़े शोधकर्ताओं कृतिका नाग, सुजाता पटनायक, वेलुस्वामी वेंकटरमणन, वर्तिका शर्मा और एमएस शेखर ने किया है।
विश्लेषण में भी सूखे की अवधि बढ़ने के संकेत मिले
अध्ययन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका डिस्कवर जियोसाइंस में प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार हिमाचल प्रदेश में लगातार सूखे वाले दिनों की अवधि प्रति दशक औसतन 4.1 दिन बढ़ने की प्रवृत्ति दर्ज की गई। पांच-पांच वर्षों के औसत पर आधारित विश्लेषण में भी सूखे की अवधि बढ़ने के संकेत मिले। तीनों क्षेत्रों की तुलना में जम्मू-कश्मीर में वर्षा के बदलते स्वरूप के अधिक स्पष्ट संकेत मिले। अध्ययन में कुल वर्षा, बारिश वाले दिनों की औसत तीव्रता, 10 मिलीमीटर और 20 मिलीमीटर या उससे अधिक वर्षा वाले दिनों की संख्या तथा भारी वर्षा में योगदान देने वाले दिनों से संबंधित सूचकांकों में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज की गई।
प्रति दशक लगभग 95.41 मिलीमीटर की कमी आई
भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में कुल बारिश में प्रति दशक लगभग 95.41 मिलीमीटर की कमी आई। वहीं, उत्तराखंड में अध्ययन अवधि के दौरान वर्षा के किसी भी सूचकांक में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण दीर्घकालिक बदलाव नहीं मिला। हालांकि, कुछ सूचकांकों में मामूली बढ़ोतरी के संकेत दिखाई दिए। शोधकर्ताओं के अनुसार पश्चिमी हिमालय में वर्षा का स्वरूप केवल वायुमंडल में उपलब्ध नमी पर निर्भर नहीं करता। पहाड़ों की ऊंचाई, भौगोलिक बनावट, हवा के ऊपर उठने की प्रक्रिया और पश्चिमी विक्षोभ जैसी मौसमी प्रणालियां भी वर्षा को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में वर्षा तथा सूखे की प्रवृत्तियां अलग-अलग दिखाई देती हैं।
एक दशक में घटी है मानसून की बारिश
भारत मौसम विज्ञान विभाग के हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. सुरेंद्र पॉल का कहना है कि पिछले एक दशक में मानसून की बारिश घटी है। इस शोध पत्र को वह देखेंगे कि इसमें किस तरह के तथ्य आए हैं।
अध्ययन हिमाचल में वर्षा के बदलते स्वरूप को रेखांकित करता है: डॉ. पुष्पेंद्र राणा
यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश में वर्षा के बदलते स्वरूप को रेखांकित करता है। विशेष रूप से वर्षा के बिना रहने वाली अवधि (शुष्क दौर) के लगातार लंबा होने और वर्षा की तीव्रता में बढ़ती अनिश्चितता की ओर संकेत करता है। इन बदलावों का जल सुरक्षा, कृषि, वनों और आपदा से निपटने की क्षमता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जलवायु निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियों को बेहतर बनाने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल योजनाएं तैयार करने की आवश्यकता है।- डॉ. पुष्पेंद्र राणा, विशेष सचिव एवं निदेशक आपदा प्रबंधन