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Rampur Bushahar News: नागछत्री की 11.43 लाख की नीलामी राशि पर ठेकेदार का दावा खारिज, वन विभाग और सरकार को मिली राहत
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अदालत में 937.67 किलो नागछत्री के स्वामित्व के प्रमाण पेश नहीं कर पाया ठेकेदार
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने पलटा निचली अदालत का फैसला
प्रकाश ठाकुर
रामपुर बुशहर। नागछत्री (सतवा) की 11.43 लाख रुपये की नीलामी राशि पर दावेदारी के मामले में वन विभाग और सरकार को राहत मिली है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश रोहड़ू की अदालत ने 937.67 किलोग्राम नागछत्री के स्वामित्व और उसकी नीलामी से प्राप्त 11,43,957 रुपये की राशि पर ठेकेदार के दावे को खारिज कर दिया है। अदालत ने वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, रोहड़ू के 30 मई 2022 के फैसले को निरस्त करते हुए सरकार और वन विभाग की अपील मंजूर कर ली।
छह जुलाई 2013 को चिड़गांव पुलिस ने नागछत्री की 937.67 किलोग्राम खेप जब्त की थी। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 379 और भारतीय वन अधिनियम की धाराओं 41 व 42 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर जब्त जड़ी-बूटी को नीलाम कर दिया गया। इससे प्राप्त 11,43,957 रुपये की राशि सावधि जमा (एफडीआर) में रखी गई।
ठेकेदार ने अदालत में दावा किया था कि वह वन विभाग में पंजीकृत निजी वन ठेकेदार है और उसके पास नागछत्री खरीदने, भंडारण करने तथा परिवहन के लिए आवश्यक अनुमति थी। उसका कहना था कि पुलिस ने चिड़गांव स्थित उसके लाइसेंसशुदा गोदाम से जड़ी-बूटी जब्त की थी। उसने नीलामी की राशि जारी करने की मांग की थी। वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश की अदालत ने 30 मई 2022 को उसके पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे सरकार और वन विभाग ने चुनौती दी।
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अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ठेकेदार के पास वन विभाग का पंजीकरण, गोदाम लाइसेंस और नागछत्री के परिवहन से संबंधित अनुमति थी, लेकिन वह जब्त खेप के स्वामित्व को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। वह यह भी नहीं बता पाया कि उसने नागछत्री किन लोगों से खरीदी थी। खरीद से संबंधित कोई दस्तावेज भी अदालत में पेश नहीं किया गया।
वहीं, सरकारी पक्ष के गवाहों ने दावा किया कि पुलिस ने नागछत्री चिड़गांव स्थित गोदाम से नहीं, बल्कि लारोट के पास नाके के दौरान वाहन से बरामद की थी। अदालत ने कहा कि ठेकेदार इस साक्ष्य को प्रभावी ढंग से खारिज नहीं कर सका। केवल वन उपज एकत्र करने का परमिट होना यह साबित नहीं करता कि जब्त की गई पूरी खेप कानूनी रूप से खरीदी गई थी और उसका परिवहन भी अधिकृत था।
इनसेट
सरकारी संपत्ति मानने की धारणा भी नहीं हुई खारिज
अदालत ने भारतीय वन अधिनियम की धारा 69 का उल्लेख करते हुए कहा कि वन उपज के सरकारी स्वामित्व से जुड़े मामलों में इसके विपरीत प्रमाण देने का दायित्व दावा करने वाले व्यक्ति पर होता है। पदम सिंह जब्त नागछत्री के स्रोत और वैध खरीद के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। ऐसे में वह न तो जड़ी-बूटी पर अपना स्वामित्व साबित कर पाया और न ही नीलामी से प्राप्त राशि पर अपना कानूनी अधिकार।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, रोहड़ू का पूर्व फैसला निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि पदम सिंह जब्त नागछत्री के स्वामित्व की घोषणा और नीलामी राशि प्राप्त करने का हकदार नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने के निर्देश दिए।
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अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने पलटा निचली अदालत का फैसला
प्रकाश ठाकुर
रामपुर बुशहर। नागछत्री (सतवा) की 11.43 लाख रुपये की नीलामी राशि पर दावेदारी के मामले में वन विभाग और सरकार को राहत मिली है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश रोहड़ू की अदालत ने 937.67 किलोग्राम नागछत्री के स्वामित्व और उसकी नीलामी से प्राप्त 11,43,957 रुपये की राशि पर ठेकेदार के दावे को खारिज कर दिया है। अदालत ने वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, रोहड़ू के 30 मई 2022 के फैसले को निरस्त करते हुए सरकार और वन विभाग की अपील मंजूर कर ली।
छह जुलाई 2013 को चिड़गांव पुलिस ने नागछत्री की 937.67 किलोग्राम खेप जब्त की थी। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 379 और भारतीय वन अधिनियम की धाराओं 41 व 42 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर जब्त जड़ी-बूटी को नीलाम कर दिया गया। इससे प्राप्त 11,43,957 रुपये की राशि सावधि जमा (एफडीआर) में रखी गई।
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ठेकेदार ने अदालत में दावा किया था कि वह वन विभाग में पंजीकृत निजी वन ठेकेदार है और उसके पास नागछत्री खरीदने, भंडारण करने तथा परिवहन के लिए आवश्यक अनुमति थी। उसका कहना था कि पुलिस ने चिड़गांव स्थित उसके लाइसेंसशुदा गोदाम से जड़ी-बूटी जब्त की थी। उसने नीलामी की राशि जारी करने की मांग की थी। वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश की अदालत ने 30 मई 2022 को उसके पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे सरकार और वन विभाग ने चुनौती दी।
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अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ठेकेदार के पास वन विभाग का पंजीकरण, गोदाम लाइसेंस और नागछत्री के परिवहन से संबंधित अनुमति थी, लेकिन वह जब्त खेप के स्वामित्व को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। वह यह भी नहीं बता पाया कि उसने नागछत्री किन लोगों से खरीदी थी। खरीद से संबंधित कोई दस्तावेज भी अदालत में पेश नहीं किया गया।
वहीं, सरकारी पक्ष के गवाहों ने दावा किया कि पुलिस ने नागछत्री चिड़गांव स्थित गोदाम से नहीं, बल्कि लारोट के पास नाके के दौरान वाहन से बरामद की थी। अदालत ने कहा कि ठेकेदार इस साक्ष्य को प्रभावी ढंग से खारिज नहीं कर सका। केवल वन उपज एकत्र करने का परमिट होना यह साबित नहीं करता कि जब्त की गई पूरी खेप कानूनी रूप से खरीदी गई थी और उसका परिवहन भी अधिकृत था।
इनसेट
सरकारी संपत्ति मानने की धारणा भी नहीं हुई खारिज
अदालत ने भारतीय वन अधिनियम की धारा 69 का उल्लेख करते हुए कहा कि वन उपज के सरकारी स्वामित्व से जुड़े मामलों में इसके विपरीत प्रमाण देने का दायित्व दावा करने वाले व्यक्ति पर होता है। पदम सिंह जब्त नागछत्री के स्रोत और वैध खरीद के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। ऐसे में वह न तो जड़ी-बूटी पर अपना स्वामित्व साबित कर पाया और न ही नीलामी से प्राप्त राशि पर अपना कानूनी अधिकार।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, रोहड़ू का पूर्व फैसला निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि पदम सिंह जब्त नागछत्री के स्वामित्व की घोषणा और नीलामी राशि प्राप्त करने का हकदार नहीं है। अदालत ने दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने के निर्देश दिए।