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हिल्स क्वीन में उम्र के अंतिम पड़ाव पर देवदार

Sat, 06 Apr 2013 01:13 AM IST
शिमला/अरुणा अचल
शिमला/अरुणा अचल Updated Sat, 06 Apr 2013 01:13 AM IST
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pine trees are finished in hills queen

अंग्रेजों की समर कैपिटल रहे शिमला में देवदारों पर संकट मंडराने लगा है। हिल्स क्वीन में देवदार के ज्यादातर पेड़ अपनी आयु पूरी कर चुके हैं।

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क्लाइमेट चेंज एवं बढ़ते कंकरीट के चलते शिमला में देवदार की नई प्लांटेशन कामयाब नहीं हो रही है। पुराने पेड़ लगातार खत्म हो रहे हैं।

वैज्ञानिकों की मानें तो शिमला में हर साल 100 से 200 देवदार के पेड़ समाप्त हो रहे हैं। ऐसे में पहाड़ों की रानी में ग्रीन लंग्स से विख्यात देवदारों को सहेजना एक चुनौती बन गया है। शिमला से कहीं देवदार गायब न हो जाएं, इसकी शंका भी जानकार जता रहे हैं।
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शिमला के सौंदर्य में चार चांद लगाने वाले और आबोहवा को खुशनुमा बनाने वाले देवदारों पर अब शहरीकरण भारी पड़ रहा है। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला की ओर से देवदारों पर हुए शोध में खुलासा हुआ है कि यहां देवदार के पेड़ों की री जनरेशन नहीं हो रही है।
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वजह, जलवायु परिवर्तन के अलावा बढ़ता शहरीकरण भी है। मिट्टी की गुणवत्ता कम होने के कारण सीड जर्मिनेशन नहीं हो रहा है। ओवरेज होने के कारण भी पेड़ों की रिप्रोडक्टिव पोटेंशियल एवं बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम हो गई है।

शिमला में मौजूदा देवदार अपनी उम्र (फिजियोलॉजिकल ऐज) पूरी कर चुके हैं। उनका स्थान लेने के लिए कोई नए या मंझौली उम्र के पेड़ नहीं हैं। देवदार की औसत आयु 120 साल मानी जाती है और शिमला में ज्यादातर देवदार इस आयु को पार कर चुके हैं। ऐसे में ये पेड़ लगातार समाप्त हो रहे हैं।

'शिमला में देवदार का रीजनरेशन स्टेटस ठीक नहीं है। इसकी वजह बढ़ता कंकरीट निर्माण और तापमान में बढ़ोतरी है। इसके अलावा नई प्लांटेशन के लिए माकूल साइट नहीं है। मौजूदा देवदार उम्र पूरी कर चुके हैं। यह अलार्मिंग स्टेज है।'
- डॉ. वीआरआर सिंह, निदेशक हिमालय अनुसंधान संस्थान, शिमला

उत्तराखंड में प्रत्यारोपित हो रहा देवदार
कमाऊं में मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) एसके सिंह का कहना है कि उत्तराखंड में नर्सरी में देवदार तैयार हो रहा है। दो साल बाद पौधे को जंगल में रोपित किया जाता है। अल्मोड़ा वन प्रभाग के अंतर्गत जागेश्वर से देवदार के वृक्षों को निकालकर सिमतोला में प्रत्यारोपित किया गया है। यह प्रयोग सफल रहा है।

डीएफओ प्रेम कुमार का कहना है कि देवदार धीमी गति से विकसित होने वाली प्रजाति है। इसकी उम्र भी लंबी होती है। गोविंद बल्लभ पंत की पटवाडांगर स्थित बायोटैक लैब के निदेशक डा. आरएस चौहान का कहना है कि लैब में टिशू कल्चर विधि से देवदार की कृत्रिम पौध तैयार की जा रही है।


पहाड़ों में देवदार को देववृक्ष का दर्जा
देवदार को पहाड़ों में काफी पवित्र माना जाता है। इसे देववृक्ष अथवा भगवान शिव वृक्ष का भी दर्जा हासिल है। आदि ग्रंथ वाल्मीकि रचित रामायण के किष्किंधा कांड में भी देवदार का उल्लेख मिलता है। दारुकवन नाम से अनेक ग्रंथों में इसका उल्लेख है।

देवदार वन प्राचीन काल से ऋषियों की एकांत साधना की स्थली रहे हैं। प्राकृतिक तौर पर देवदार की लकड़ी कीटरोधक होती है। देवदार की लकड़ी का तेल फंगस और कीटनाशक है। इसकी लकड़ी बेहद कठोर और इमारती उपयोग के लिए बेहद मुफीद होती है।

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