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आज भी राजदेवता के सम्मान में झुकते हैं सभी देव
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अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि महोत्सव में आए देवता।
- फोटो : Mandi
मंडी। महाशिवरात्रि महोत्सव में सजने वाले राजदरबार में राजदेवता माधोराय और राजा के सम्मान में देवताओं के शीश झुकाने की रीत आज भी जीवंत है। सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर देवता छोटी काशी में देव मिलन करते हैं। सात दिन के महोत्सव में यह अनूठा नजारा देखने को मिलता है।
रियासतकाल से चली आ रही देव परंपरा आज भी जारी है। राज पुरोहित पवन शर्मा ने कहा कि सदियों की परंपरा का आज भी बखूबी निर्वहन किया जा रहा है। राज दरबार में देवता शीश नवाते हैं। राजा देवता की पूजा-अर्चना करते हैं। देव परंपरा के अनुसार राजदरबार में देवताओं की पूजा की जाती है।
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1527 से मनाया जाता है महाशिवरात्रि महोत्सव
1527 ईस्वी में राजा अजबर सेन ने बाबा भूतनाथ मंदिर के साथ ही आधुनिक मंडी शहर की स्थापना की थी। मंडी नगर की स्थापना के साथ ही देवी-देवताओं का छोटी काशी में आगमन का सिलसिला शुरू हुआ। इससे आज भी यहां देवता और मानव के रिश्ते मानवीय धरातल पर विद्यमान हैं। यहां पर सदियों बाद ही उसी अंदाज में दरबार सजता है और देव राजा के सम्मान में दरबार में हाजिरी भरते हैं।
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राजा सूरज सेन ने दिलाई थी उत्सव को पहचान
मंडी महाशिवरात्रि को लोकोत्सव का स्वरूप प्रदान करने का श्रेय राजा सूरज सेन को जाता है। सूरज सेन की दस रानियां और 18 पुत्र थे। एक के बाद एक सभी बेटे काल का ग्रास होने पर राजा भयभीत हो उठे। उन्हें अपना राज्य छिन जाने की आशंका सताने लगी। मगर राजा ने कूटनीति से काम लेते हुए अपना राज्य भगवान विष्णु के प्रतीक माधोराय को समर्पित कर दिया और स्वयं राज्य के संरक्षक बन गए। सूरज सेन ने ही मंडी महाशिवरात्रि को लोकोत्सव का स्वरूप प्रदान करते हुए जनपद के देवी-देवताओं को एक सप्ताह तक मंडी नगर में मेहमान बनाकर रखने की परंपरा डाली।
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रियासतकाल से चली आ रही देव परंपरा आज भी जारी है। राज पुरोहित पवन शर्मा ने कहा कि सदियों की परंपरा का आज भी बखूबी निर्वहन किया जा रहा है। राज दरबार में देवता शीश नवाते हैं। राजा देवता की पूजा-अर्चना करते हैं। देव परंपरा के अनुसार राजदरबार में देवताओं की पूजा की जाती है।
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1527 से मनाया जाता है महाशिवरात्रि महोत्सव
1527 ईस्वी में राजा अजबर सेन ने बाबा भूतनाथ मंदिर के साथ ही आधुनिक मंडी शहर की स्थापना की थी। मंडी नगर की स्थापना के साथ ही देवी-देवताओं का छोटी काशी में आगमन का सिलसिला शुरू हुआ। इससे आज भी यहां देवता और मानव के रिश्ते मानवीय धरातल पर विद्यमान हैं। यहां पर सदियों बाद ही उसी अंदाज में दरबार सजता है और देव राजा के सम्मान में दरबार में हाजिरी भरते हैं।
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राजा सूरज सेन ने दिलाई थी उत्सव को पहचान
मंडी महाशिवरात्रि को लोकोत्सव का स्वरूप प्रदान करने का श्रेय राजा सूरज सेन को जाता है। सूरज सेन की दस रानियां और 18 पुत्र थे। एक के बाद एक सभी बेटे काल का ग्रास होने पर राजा भयभीत हो उठे। उन्हें अपना राज्य छिन जाने की आशंका सताने लगी। मगर राजा ने कूटनीति से काम लेते हुए अपना राज्य भगवान विष्णु के प्रतीक माधोराय को समर्पित कर दिया और स्वयं राज्य के संरक्षक बन गए। सूरज सेन ने ही मंडी महाशिवरात्रि को लोकोत्सव का स्वरूप प्रदान करते हुए जनपद के देवी-देवताओं को एक सप्ताह तक मंडी नगर में मेहमान बनाकर रखने की परंपरा डाली।