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Kullu News: मशीन युग में भी स्पीति में जिंदा है परंपरागत खेती की परंपरा
Wed, 07 May 2025 11:28 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
Updated Wed, 07 May 2025 11:28 AM IST
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लाहौल-स्पीति घाटी की लोसर में चुरू से खेत जोतते किसान।-संवाद
उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। देश-प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में जहां खेती पूरी तरह आधुनिक यंत्रों पर निर्भर हो चुकी है, वहीं हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी आज भी अपनी सदियों पुरानी खेती की परंपरा को जीवंत रखे हुए है। यहां खेतों की जुताई अब भी याक और चुरू जैसे पारंपरिक पशुओं की मदद से की जाती है।
स्पीति के 70 फीसदी घरों में आज भी याक और चुरू पाले जाते हैं, जो न केवल खेतों की जुताई में बल्कि सामान ढोने जैसे अन्य कार्यों में भी उपयोग किए जाते हैं। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए आने वाले पर्यटक भी रोमांचित हो उठते हैं और खेतों में हल जोतते इन पशुओं के दृश्य को कैमरे में कैद करना नहीं भूलते।
वीर सिंह और सोनम स्थानीय किसान बताते हैं कि भले ही पावर टिलर घरों में आ चुके हैं, लेकिन परंपरागत हल जोतने की विधि को उन्होंने छोड़ा नहीं है। उनका मानना है कि याक और चुरू स्पीति की जलवायु और खेतों की बनावट के लिए अब भी सबसे अनुकूल हैं। स्पीति में बारिश बहुत कम होती है, इसलिए फसलों की सिंचाई मुख्य रूप से नालियों (मेड़) पर आधारित होती है। इन नालियों की खुदाई में भी याक और चुरू बेहद उपयोगी साबित होते हैं।
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ग्यू से लेकर डंखर पंचायत तक लोग मटर और जौ के अलावा सेब के बागान भी लगा रहे हैं, लेकिन पारंपरिक खेती का जो रिश्ता यहां की मिट्टी और लोगों के जीवन से जुड़ा है, वह आज भी उतना ही मजबूत है। नई पीढ़ी भी इस विरासत को सहेज कर चल रही है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रमाण है।
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स्पीति के 70 फीसदी घरों में आज भी याक और चुरू पाले जाते हैं, जो न केवल खेतों की जुताई में बल्कि सामान ढोने जैसे अन्य कार्यों में भी उपयोग किए जाते हैं। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए आने वाले पर्यटक भी रोमांचित हो उठते हैं और खेतों में हल जोतते इन पशुओं के दृश्य को कैमरे में कैद करना नहीं भूलते।
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वीर सिंह और सोनम स्थानीय किसान बताते हैं कि भले ही पावर टिलर घरों में आ चुके हैं, लेकिन परंपरागत हल जोतने की विधि को उन्होंने छोड़ा नहीं है। उनका मानना है कि याक और चुरू स्पीति की जलवायु और खेतों की बनावट के लिए अब भी सबसे अनुकूल हैं। स्पीति में बारिश बहुत कम होती है, इसलिए फसलों की सिंचाई मुख्य रूप से नालियों (मेड़) पर आधारित होती है। इन नालियों की खुदाई में भी याक और चुरू बेहद उपयोगी साबित होते हैं।
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ग्यू से लेकर डंखर पंचायत तक लोग मटर और जौ के अलावा सेब के बागान भी लगा रहे हैं, लेकिन पारंपरिक खेती का जो रिश्ता यहां की मिट्टी और लोगों के जीवन से जुड़ा है, वह आज भी उतना ही मजबूत है। नई पीढ़ी भी इस विरासत को सहेज कर चल रही है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रमाण है।