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Kullu News: शेर पर सवार माता की पूजा के बाद शुरू होती है लंका दहन की परंपरा
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कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में माता बाला त्रिपुरा सुंदरी की आराधना के बिना लंका दहन की परंपरा अधूरी मानी जाती है। दशहरा उत्सव में माता की विशेष पूजा-अर्चना सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और राज परिवार की परंपराओं से जुड़ी है। सोमवार को इस परंपरा का विधि-विधान के साथ निर्वहन किया गया।
सुल्तानपुर स्थित राजमहल में देर शाम माता के पुजारी का विशेष शृंगार किया गया। इसके बाद माता के स्वरूप में सजे पुजारी को भगवान रघुनाथ के ढालपुर स्थित अस्थायी शिविर में लाया गया। इसी दौरान माता के शिविर में एक व्यक्ति को शेर का स्वरूप देकर उसका भी शृंगार किया गया। शेर को भगवान रघुनाथ के शिविर में लाने के बाद माता के स्वरूप में विराजमान पुजारी शेर पर सवार हुए। इसके बाद विशेष पूजा-अर्चना की गई।
यह धार्मिक अनुष्ठान लंका दहन से पहले किया जाता है। मान्यता के अनुसार इस पूजा के बाद ही लंका दहन की परंपरा आगे बढ़ती है। कुल्लू दशहरा में इस अनुष्ठान का विशेष धार्मिक महत्व है और श्रद्धालु इसे माता की शक्ति और आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं। माता के पुजारी मोनू ने बताया कि माता का नाम विद्या राज राजेश्वरी है और स्थानीय भाषा में उन्हें बड़ी देवी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि माता राजपरिवार की प्रमुख कुल देवी हैं। दशहरा उत्सव में उनकी पूजा-अर्चना की विशेष परंपरा है, जिसका निर्वहन लंका दहन से पूर्व की रात्रि में किया जाता है। ऊझी घाटी के शाड़ी शौह में माता का मुख्य मंदिर है। इस क्षेत्र में माता के तीन प्रमुख मंदिर हैं, जहां अलग-अलग स्वरूपों में उनकी पूजा की जाती है। माता को महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूपों में आराध्य माना जाता है। संवाद
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सुल्तानपुर स्थित राजमहल में देर शाम माता के पुजारी का विशेष शृंगार किया गया। इसके बाद माता के स्वरूप में सजे पुजारी को भगवान रघुनाथ के ढालपुर स्थित अस्थायी शिविर में लाया गया। इसी दौरान माता के शिविर में एक व्यक्ति को शेर का स्वरूप देकर उसका भी शृंगार किया गया। शेर को भगवान रघुनाथ के शिविर में लाने के बाद माता के स्वरूप में विराजमान पुजारी शेर पर सवार हुए। इसके बाद विशेष पूजा-अर्चना की गई।
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यह धार्मिक अनुष्ठान लंका दहन से पहले किया जाता है। मान्यता के अनुसार इस पूजा के बाद ही लंका दहन की परंपरा आगे बढ़ती है। कुल्लू दशहरा में इस अनुष्ठान का विशेष धार्मिक महत्व है और श्रद्धालु इसे माता की शक्ति और आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं। माता के पुजारी मोनू ने बताया कि माता का नाम विद्या राज राजेश्वरी है और स्थानीय भाषा में उन्हें बड़ी देवी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि माता राजपरिवार की प्रमुख कुल देवी हैं। दशहरा उत्सव में उनकी पूजा-अर्चना की विशेष परंपरा है, जिसका निर्वहन लंका दहन से पूर्व की रात्रि में किया जाता है। ऊझी घाटी के शाड़ी शौह में माता का मुख्य मंदिर है। इस क्षेत्र में माता के तीन प्रमुख मंदिर हैं, जहां अलग-अलग स्वरूपों में उनकी पूजा की जाती है। माता को महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूपों में आराध्य माना जाता है। संवाद
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