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हिडिंबा के बिना नहीं निकलती रघुनाथ की रथयात्रा

Sun, 09 Oct 2016 10:30 PM IST
कुल्लू
कुल्लू Updated Sun, 09 Oct 2016 10:30 PM IST
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raghunath temple
kullu devta - फोटो : kullu devta

ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में सात दिनों तक मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय लोकनृत्य उत्सव कुल्लू दशहरा की धार्मिक मान्यताओं, आरंभिक परंपराओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पर्यटन, व्यापार व मनोरंजन की दृष्टि से अद्वितीय पहचान है। दशहरा उत्सव स्थानीय लोगों में विजय दशमी के नाम से प्रचलित है। दशहरा उत्सव के मुख्यत: तीन भाग ठाकुर निकालना, मोहल्ला और लंका दहन है। इस उत्सव के आयोजन में देवी हिडिंबा की उपस्थिति अनिवार्य है। देवी हिडिंबा के बिना रघुनाथ जी की रथयात्रा नहीं निकल पाती है। दशहरे के आरंभ में सर्वप्रथम राजाओं के वंशजों द्वारा देवी हिडिंबा की पूजा-अर्चना की जाती है तथा राजमहल से रघुनाथ जी की सवारी रथ मैदान ढालपुर की ओर निकल पड़ती है। ढालपुर रथ मैदान में रघुनाथ जी की प्रतिमा को सुसज्जित रथ में रखा जाता है। प्रत्येक देवी-देवता की पालकी के साथ ग्रामवासी पारंपरिक वाद्य यंत्रों सहित उपस्थित होते हैं। इन वाद्य यंत्रों की लयबद्ध ध्वनि व जयघोश से वातावरण में रघुनाथ की प्रतिमा रखे रथ को जनसमूह द्वारा खींचकर ढालपुर मैदान के मध्य तक लाया जाता है, जहां पूर्व में स्थापित शिविर में रघुनाथ जी की प्रतिमा रखी जाती है। रघुनाथ जी की इस रथयात्रा को ‘ठाकुर’ निकालना कहते हैं।

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रथयात्रा के साथ कुल्लवी परंपराओं, मान्यताओं, देवसंस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, वाद्य यंत्रों की धुनों, देवी-देवताओं में आस्था, श्रद्धा व उल्लास का एक अनूठा संगम होता है। मोहल्ले के नाम से प्रख्यात दशहरे के छठे दिन सभी देवी-देवता रघुनाथ जी के शिविर में शीश नवाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। मोहल्ले के दिन रात्रि में रघुनाथ शिविर के सामने शक्ति पूजन किया जाता है। दशहरा उत्सव के अंतिम दिन शिविर में से रघुनाथ जी की मूर्ति को निकालकर रथ में रखा जाता है तथा इस रथ को खींचकर मैदान के अंतिम छोर तक लाया जाता है। दशहरे में उपस्थित देवी-देवता इस यात्रा में शरीक होते हैं। ब्यास नदी के तट पर एकत्रित घास व लकड़ियों को आग लगाने के पश्चात पांच बलियां दी जाती हैं तथा रथ को पुन: खींचकर रथ मैदान तक लाया जाता है। इसी के साथ लंका दहन की समाप्ति हो जाती है तथा रघुनाथ जी की पालकी को वापस मंदिर लाया जाता है। देवी-देवता भी अपने-अपने गांव के लिए प्रस्थान करते हैं। ठाकुर निकलने से लंका दहन तक की अवधि में पर्यटकों के लिए एक विशेष आकर्षण रहता है। इस दौरान उन्हें यहां की भाषा वेशभूषा, देव परंपराओं और सभ्यता से रूबरू होने का मौका मिलता है।

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