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Kullu News: आपदा का दंश झेल रहा मातला, न घर बचे न जमीन, उजड़ गया पूरा गांव

Thu, 18 Sep 2025 10:47 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू Updated Thu, 18 Sep 2025 10:47 PM IST
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Matala is facing the brunt of the disaster, neither homes nor land remain, the entire village is devastated.
सैंज घाटी के मातला गांव को उजाड़ गई आपदा, लोगों के न घर बचे और न ही जमीन
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कई स्कूल तो कोई तंबू में काट रहा रातें, चिंता- कहां जाएंगे गांव में रहने वाले 32 परिवार

गौरीशंकर
कुल्लू। सैंज घाटी का मातला अब बचे-खुचे मलबे का गांव है। जहां कभी बच्चों की किलकारी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ चुप्पी और दरारों की आहट है। जमीन धंस चुकी है, मकान गिर चुके हैं। जो घर बचे हैं, उनमें भी दरारें आ गई हैं।
मातला के 32 परिवारों की कहानी सिर्फ बेघर होने की नहीं, बल्कि जड़ से उखड़ जाने की है। अब न घर हैं, न खेत और न ही रोजगार। सिर्फ एक ही सवाल है कि अब कहां जाएं।
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मातला गांव के बुजुर्ग प्रेम कहते हैं लोगों ने बड़ी मुश्किल से घर बनाए थे। सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन बरसात ने हंसते खेलते गांव को उजाड़ दिया। गांव के 32 परिवार कहां जाएंगे, यह सोचकर हर शख्स परेशान है। उन्होंने 1998 से घर बनाने का काम शुरू किया था। काम अभी चल रहा था। इस घर में 19 कमरे थे। इसमें तीन परिवार रह रहे थे। पूरा मकान जमीन के साथ दरक गया। अब परिवारों को अलग-अलग क्षेत्र में किराये के कमरों में रहना पड़ रहा है। आपदा में घर तो गया ही, जमीन भी चली गई।
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प्रभावित खेम राज ने कहा कि उनकी जमीन भी धंस गई है। मकान में दरारें आ गई हैं। यह रहने लायक नहीं बचा है। तंबू लगाकर रह रहे हैं। वह 33 वर्ष के हो चुके हैं। यह गांव उनके दादा-परदारा से पहले का है। इससे पहले कभी ऐसी आपदा नहीं आई। इस बार बरसात ने पूरे गांव को उजाड़ दिया। नया घर बनाने का काम शुरू किया था लेकिन वह भी आपदा की भेंट चढ़ गया।
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मवेशियों को छोड़कर कैसे जाएं, गोशाला में काट रहे रातें
गुमत राम कहते हैं कि प्रशासन ने प्रभाविताें के लिए रहने की व्यवस्था सैंज के पास की है। मवेशियों को गांव में छोड़कर कैसे चार किलोमीटर दूर जाएंगे। बच्चों को स्कूल के कमरे में रखना पड़ रहा है। खुद टूटे हुए मकान के साथ बनी गोशाला के कमरे में सो रहे हैं। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को हो रही है। हम तो कहीं भी वक्त बिता लेंगे लेकिन बच्चों और बुजुर्गों को कहां रखें, यह चिंता सता रही है।

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एनएचपीसी की डंपिंग साइट में ठहरा दे प्रशासन
मातला गांव में 14 से अधिक मकान मलबे का ढेर बन गए हैं। अब सिर्फ दो से तीन मकानों के ढांचे बचे हैं। ये भी रहने लायक नहीं हैं। गांव के पीछे पूरा क्षेत्र धंस रहा है। इससे गांव दोबारा बस पाने की उम्मीद भी धूमिल हो गई है। प्रभावितों की मानें तो प्रशासन को सुझाव दिया है कि कुछ समय के लिए प्रभावितों के रहने के लिए एनएचपीसी की डंपिंग साइट को दिया जाए जिससे उन्हें ज्यादा दूर न जाना पड़े और प्रभावितों के लिए ठिकाना भी मिल जाए।
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