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हिमाचल: आसमान में दिखा श्रीराम का वनवास से लंका दहन तक का सफर, 500 ड्रोन ने रचा इतिहास; दृश्यों ने मोहा मन
Fri, 23 Oct 2026 10:09 AM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू।
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Fri, 23 Oct 2026 10:09 AM IST
सार
तरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में पहली बार 500 ड्रोन के माध्यम से भव्य शो आयोजित किया गया। करीब आधे घंटे तक चले इस शो में भगवान श्रीराम के वनवास से लेकर लंका दहन तक की कहानी और हिमाचली संस्कृति की झलक आसमान में दिखाई गई।
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500 ड्रोन से सजी कुल्लू दशहरे की शाम
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में पहली बार 500 ड्रोन के माध्यम से आकर्षक ड्रोन शो आयोजित किया गया। देर शाम ऐतिहासिक ढालपुर मैदान के आसमान में ड्रोन की मदद से भगवान श्रीराम और हिमाचल की संस्कृति से जुड़ी आकृतियां प्रदर्शित की गईं। उत्सव के लिए यह एक ऐतिहासिक पल रहा और इस आधुनिक प्रस्तुति ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
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करीब आधे घंटे तक चले इस ड्रोन शो में भगवान श्रीराम के वनवास से लेकर लंका दहन तक की कहानी को विभिन्न आकृतियों के माध्यम से दर्शाया गया। एक साथ 500 ड्रोन ने आसमान में अलग-अलग दृश्य उकेरे, जिनमें रामायण के प्रसंगों के साथ हिमाचली संस्कृति की झलक भी देखने को मिली।
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आसमान में दिखाई दी रामायण की कहानी
ढालपुर मैदान के ऊपर आयोजित ड्रोन शो को देखने के लिए लोगों में खासा उत्साह रहा। आसमान में रोशनी से उभरती भगवान श्रीराम की आकृतियों और रामायण के प्रसंगों ने दर्शकों को आकर्षित किया। ड्रोन के माध्यम से प्रस्तुत की गई इस कहानी ने कुल्लू दशहरा उत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नया आकर्षण जोड़ा। विदेशी पर्यटकों ने भी इस खास नजारे को अपने कैमरों में कैद किया। 500 ड्रोन के एक साथ समन्वित प्रदर्शन ने उत्सव में पहुंचे लोगों को तकनीक और संस्कृति के अनूठे मेल का अनुभव करवाया।
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लेजर लाइटिंग शो भी रहा आकर्षण का केंद्र
ड्रोन शो के साथ-साथ रथ मैदान में आयोजित लेजर लाइटिंग शो भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहा। दोनों आयोजनों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में आधुनिक तकनीक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का संगम देखने को मिला। कुल्लू दशहरा उत्सव में ड्रोन शो का आयोजन कार्यक्रमों में एक नया आयाम जोड़ने वाला रहा। भगवान श्रीराम की आकृतियों और हिमाचली संस्कृति की झलक ने उत्सव की रौनक बढ़ाई।
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दशहरा में 64 वर्ष बाद शरीक हुए व्यासर के तीन देवी-देवता
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में तीन और देवी-देवता 64 साल बाद शामिल हुए हैं। फाटी व्यासर कोठी रायसन के देवता कुंबर दान नाग, माता फंगणी और बाबा वीरनाथ ने इस बार उत्सव में शामिल होने की इच्छा जताई थी। इसके चलते हारियानों ने देवी-देवताओं को लाव लश्कर के साथ जिला मुख्यालय पहुंचाया। लिहाजा, इन देवी-देवताओं को बैठने के लिए राजा की चानणी के पीछे जगह दी गई है, जहां ये देवता टेंटों में विराजमान हो गए हैं।
देवता कुंबर दान नाग के गुर यशपाल ने बताया कि उनके तीन देवी-देवता 64 साल बाद उत्सव में शरीक होने के लिए पहुंचे हैं। हालांकि, इससे पहले उत्सव में आने की परंपरा रही है लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब देवी-देवताओं के साथ आने वाले लोगों को खर्च आदि की परेशानी होती थी। इस कारण देवताओं को उत्सव में नहीं लाया जा सका। इस बार देवताओं ने अपने गुर के माध्यम से देववाणी कर आदेश दिए थे कि वह भगवान रघुनाथ की चाकरी यानी सेवा करने जाना है। उन्होंने बताया कि हालांकि हमने पूर्वजों से सुना था कि उनके देवी-देवताओं का उत्सव के दौरान बैठने का स्थान प्रदर्शनी मैदान में मोहणी के पेड़ के नीचे था लेकिन उन्हें चानणी के पास जगह दी गई है। इससे हारियान खुश हैं।
देवता के कारदार ओम प्रकाश का कहना है कि इससे पहले वर्ष 1962 में उनके देवी-देवता दशहरा उत्सव में शामिल हुए थे। उस समय उनके दादा तुलू राम कारदार थे। इसके बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि हरियान देवी-देवताओं को उत्सव में नहीं ले जा सके जबकि उत्सव में देवी-देवताओं को दशहरा समिति से हर बार निमंत्रण मिलता रहा है।
हर जगह एक साथ जाते हैं तीनों देवी-देवता
तीनों देवताओं की खासियत यह है कि हर जगह तीनों एकसाथ ही जाते हैं। गुर यशपाल का कहना है कि देवता कुंबर दान नाग और देवता वीरनाथ गौहरी के रथ बने हुए हैं। माता फुंगणी करनाल में बास करती हैं। उनका कहना है कि क्षेत्र में कोई भी देव आयोजन हो या फिर कहीं भी आना-जाना हो तो तीनों देवी-देवता एक साथ ही चलते हैं। देवता कुंबर दान नाग ठारा नागों में से एक हैं।
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में तीन और देवी-देवता 64 साल बाद शामिल हुए हैं। फाटी व्यासर कोठी रायसन के देवता कुंबर दान नाग, माता फंगणी और बाबा वीरनाथ ने इस बार उत्सव में शामिल होने की इच्छा जताई थी। इसके चलते हारियानों ने देवी-देवताओं को लाव लश्कर के साथ जिला मुख्यालय पहुंचाया। लिहाजा, इन देवी-देवताओं को बैठने के लिए राजा की चानणी के पीछे जगह दी गई है, जहां ये देवता टेंटों में विराजमान हो गए हैं।
देवता कुंबर दान नाग के गुर यशपाल ने बताया कि उनके तीन देवी-देवता 64 साल बाद उत्सव में शरीक होने के लिए पहुंचे हैं। हालांकि, इससे पहले उत्सव में आने की परंपरा रही है लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब देवी-देवताओं के साथ आने वाले लोगों को खर्च आदि की परेशानी होती थी। इस कारण देवताओं को उत्सव में नहीं लाया जा सका। इस बार देवताओं ने अपने गुर के माध्यम से देववाणी कर आदेश दिए थे कि वह भगवान रघुनाथ की चाकरी यानी सेवा करने जाना है। उन्होंने बताया कि हालांकि हमने पूर्वजों से सुना था कि उनके देवी-देवताओं का उत्सव के दौरान बैठने का स्थान प्रदर्शनी मैदान में मोहणी के पेड़ के नीचे था लेकिन उन्हें चानणी के पास जगह दी गई है। इससे हारियान खुश हैं।
देवता के कारदार ओम प्रकाश का कहना है कि इससे पहले वर्ष 1962 में उनके देवी-देवता दशहरा उत्सव में शामिल हुए थे। उस समय उनके दादा तुलू राम कारदार थे। इसके बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि हरियान देवी-देवताओं को उत्सव में नहीं ले जा सके जबकि उत्सव में देवी-देवताओं को दशहरा समिति से हर बार निमंत्रण मिलता रहा है।
हर जगह एक साथ जाते हैं तीनों देवी-देवता
तीनों देवताओं की खासियत यह है कि हर जगह तीनों एकसाथ ही जाते हैं। गुर यशपाल का कहना है कि देवता कुंबर दान नाग और देवता वीरनाथ गौहरी के रथ बने हुए हैं। माता फुंगणी करनाल में बास करती हैं। उनका कहना है कि क्षेत्र में कोई भी देव आयोजन हो या फिर कहीं भी आना-जाना हो तो तीनों देवी-देवता एक साथ ही चलते हैं। देवता कुंबर दान नाग ठारा नागों में से एक हैं।