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Kullu News: टिशू कल्चर से तैयार सेब के पौधे दो साल में दे रहे फसल
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कुल्लू। जिले में टिशू कल्चर तकनीक से सेब और अन्य फलदार पौधों की उन्नत किस्में तैयार की जा रही हैं। इस तकनीक से तैयार पौधे दो साल में फसल देना शुरू कर रहे हैं। मौहल के बागवान देवराज राणा ने कहा कि बागवानी विभाग की मदद से विश्व बैंक की हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास परियोजना के माध्यम से 1.98 करोड़ की लागत से प्रयोगशाला स्थापित की है। इसमें टिशू कल्चर तकनीक से पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
लगघाटी के किसान हीरा लाल ने देवराज राणा की टिशू कल्चर लैब से तैयार पौधों का बगीचा एक बीघा भूमि में लगाया था। वर्ष 2019 मार्च में लगाई गई नई वैरायटी के सेब ने 2020 और 21 में फल देना शुरू कर दिया है। 2023 में 250 पौधों से 20 किलो के 200 क्रेट उत्पादन हुआ है। उन्होंने बताया कि इस सेब की मंडियों में अधिक मांग है। हीरा लाल ने बताया कि वर्षों पुराने रॉयल के पेड़ भी उनके पास हैं। इन 250 पौधों के मुकाबले वे इतनी फसल नहीं दे पाते हैं। अब आने वाले समय में बाकी जगहों पर भी इन किस्मों के पौधों को लगाया जाएगा।
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क्या है टिशू कल्चर तकनीक
देवराज राणा कहते हैं कि टिशू कल्चर एक ऐसी तकनीक है जिसका उपयोग पौधों को फैलाने के लिए मूल पौधे से छोटे नमूने लेकर उन्हें एक प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों में तैयार किया जाता है। इस तकनीक का आमतौर पर सेब के पेड़ों के उत्पादन में उपयोग किया जाता है, क्योंकि यह उत्पादकों को बड़ी संख्या में रोग मुक्त पेड़ों का उत्पादन करने में सहायता करता है।
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लगघाटी के किसान हीरा लाल ने देवराज राणा की टिशू कल्चर लैब से तैयार पौधों का बगीचा एक बीघा भूमि में लगाया था। वर्ष 2019 मार्च में लगाई गई नई वैरायटी के सेब ने 2020 और 21 में फल देना शुरू कर दिया है। 2023 में 250 पौधों से 20 किलो के 200 क्रेट उत्पादन हुआ है। उन्होंने बताया कि इस सेब की मंडियों में अधिक मांग है। हीरा लाल ने बताया कि वर्षों पुराने रॉयल के पेड़ भी उनके पास हैं। इन 250 पौधों के मुकाबले वे इतनी फसल नहीं दे पाते हैं। अब आने वाले समय में बाकी जगहों पर भी इन किस्मों के पौधों को लगाया जाएगा।
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क्या है टिशू कल्चर तकनीक
देवराज राणा कहते हैं कि टिशू कल्चर एक ऐसी तकनीक है जिसका उपयोग पौधों को फैलाने के लिए मूल पौधे से छोटे नमूने लेकर उन्हें एक प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों में तैयार किया जाता है। इस तकनीक का आमतौर पर सेब के पेड़ों के उत्पादन में उपयोग किया जाता है, क्योंकि यह उत्पादकों को बड़ी संख्या में रोग मुक्त पेड़ों का उत्पादन करने में सहायता करता है।
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