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लाहौल में रही फागली उत्सव की धूम
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फागली उत्सव
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो।
कोकसर/ केलांग (लाहौल-स्पीति)। जनजातीय क्षेत्र लाहौल की पट्टन घाटी के मूलिंग, गोशाल, जहालमा से लेकर तिंदी तक फागली उत्सव धूमधाम के साथ मनाया गया। बर्फ से लकदक घाटी के लोगों में भारी उत्साह देखा गया। गोशाल के ग्रामीणों ने सुबह से ही स्थानीय मंदिर में एकत्रित होकर पूजा-अर्चना की और सामूहिक भोज का आयोजन किया गया।
घाटी के अन्य हिस्सों में भी ग्रामीणों ने अपने-अपने ईष्ट देवी-देवताओं की पूजा के बाद गांव के सभी घरों में जाकर पारंपरिक पकवानों का आदान प्रदान कर खुशियां बांटी। इस मौके पर समूची घाटी परंपरागत स्वादिष्ट व्यंजनों से महक उठी। फागली के दिन घाटी के लोगों ने अपने बुजुर्गों को जूब भेंट कर आशीर्वाद लिया। लाहौल की भिन्न-भिन्न घाटी के लोगों ने फागली को अलग-अलग नाम दिए हैं। इनमें कुहन, कुस, फागली, लोसर व जुकारू शामिल हैं। फागली की पूर्व संध्या पर लोगों ने माता लक्ष्मी आदि देवी, देवताओं की पूजा पाठ के बाद ईष्ट देवों से सुख-समृद्धि व खुशहाली की कामना की। मान्यता है कि सर्दियों में बर्फ अधिक पड़ने से लोग कई महीने तक एक-दूसरे से अलग-थलग पड़ जाते थे। सर्दियों में राक्षसों एवं आसुरी शक्तियों का आतंक अधिक हो जाने के कारण लोग घरों से बाहर कम ही निकलते थे। ऐसे में लोग ईष्ट देवी-देवताओं से प्रार्थना करते थे कि उनकी रक्षा की जाए। इस मौके पर पारंपरिक मीठे व नमकीन व्यंजन व सिड्डू आदि परोसे गए। मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा, पूर्व विधायक रवि ठाकुर, डीसीसी अध्यक्ष ज्ञालछन ठाकुर व प्रवक्ता अनिल सहगल ने लोगों को पर्व की बधाई दी है।
एक दिन तक नहीं जाते नलके के पास
लाहौल के लिंडूर वासी फागली त्यौहार के 20 दिन तक अपने गांव से बाहर नहीं निकलते हैं। लिंडूर निवासी सुरेश और प्रकाश ने बताया कि पूरे लाहौल में इस उत्सव के एक दिन पहले ही पानी को भरकर रखा जाता है। मान्यता के अनुसार गांव के लोग एक दिन तक नल के पास नहीं जा सकते। पानी को समर्पित इस त्यौहार के दूसरे दिन नलों में घी चढ़ाकर और फूल अर्पित कर पूजा कर पानी भरने की प्रथा है।
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कोकसर/ केलांग (लाहौल-स्पीति)। जनजातीय क्षेत्र लाहौल की पट्टन घाटी के मूलिंग, गोशाल, जहालमा से लेकर तिंदी तक फागली उत्सव धूमधाम के साथ मनाया गया। बर्फ से लकदक घाटी के लोगों में भारी उत्साह देखा गया। गोशाल के ग्रामीणों ने सुबह से ही स्थानीय मंदिर में एकत्रित होकर पूजा-अर्चना की और सामूहिक भोज का आयोजन किया गया।
घाटी के अन्य हिस्सों में भी ग्रामीणों ने अपने-अपने ईष्ट देवी-देवताओं की पूजा के बाद गांव के सभी घरों में जाकर पारंपरिक पकवानों का आदान प्रदान कर खुशियां बांटी। इस मौके पर समूची घाटी परंपरागत स्वादिष्ट व्यंजनों से महक उठी। फागली के दिन घाटी के लोगों ने अपने बुजुर्गों को जूब भेंट कर आशीर्वाद लिया। लाहौल की भिन्न-भिन्न घाटी के लोगों ने फागली को अलग-अलग नाम दिए हैं। इनमें कुहन, कुस, फागली, लोसर व जुकारू शामिल हैं। फागली की पूर्व संध्या पर लोगों ने माता लक्ष्मी आदि देवी, देवताओं की पूजा पाठ के बाद ईष्ट देवों से सुख-समृद्धि व खुशहाली की कामना की। मान्यता है कि सर्दियों में बर्फ अधिक पड़ने से लोग कई महीने तक एक-दूसरे से अलग-थलग पड़ जाते थे। सर्दियों में राक्षसों एवं आसुरी शक्तियों का आतंक अधिक हो जाने के कारण लोग घरों से बाहर कम ही निकलते थे। ऐसे में लोग ईष्ट देवी-देवताओं से प्रार्थना करते थे कि उनकी रक्षा की जाए। इस मौके पर पारंपरिक मीठे व नमकीन व्यंजन व सिड्डू आदि परोसे गए। मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा, पूर्व विधायक रवि ठाकुर, डीसीसी अध्यक्ष ज्ञालछन ठाकुर व प्रवक्ता अनिल सहगल ने लोगों को पर्व की बधाई दी है।
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एक दिन तक नहीं जाते नलके के पास
लाहौल के लिंडूर वासी फागली त्यौहार के 20 दिन तक अपने गांव से बाहर नहीं निकलते हैं। लिंडूर निवासी सुरेश और प्रकाश ने बताया कि पूरे लाहौल में इस उत्सव के एक दिन पहले ही पानी को भरकर रखा जाता है। मान्यता के अनुसार गांव के लोग एक दिन तक नल के पास नहीं जा सकते। पानी को समर्पित इस त्यौहार के दूसरे दिन नलों में घी चढ़ाकर और फूल अर्पित कर पूजा कर पानी भरने की प्रथा है।
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