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खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्ट: संजय हजारिका बोले- इंदिरा गांधी ने रखी थी मिजोरम में शांति वार्ताओं की नींव

Fri, 23 Oct 2026 11:11 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, सोलन।
संवाद न्यूज एजेंसी, सोलन। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 23 Oct 2026 11:11 PM IST
सार

जाने-माने लेखक व पत्रकार संजय हजारिका ने अपनी किताब ‘मिजोरम : फ्रॉम बैटल फिल्ड टू बैलेट बॉक्स’पर चर्चा करते हुए कहा कि कैसे इस पूर्वोत्तर राज्य ने हिंसा और हथियारों के दौर को पीछे छोड़कर मतदान पेटी को अपनाया। 

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Khushwant Singh LitFest: Sanjoy Hazarika says Indira Gandhi laid the foundation for peace talks in Mizoram
जाने-माने लेखक व पत्रकार संजय हजारिका। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्ट-2026 के एक विशेष सत्र में मिजोरम के अशांत अतीत से शांतिपूर्ण लोकतंत्र तक के सफर पर गहन चर्चा हुई। जाने-माने लेखक व पत्रकार संजय हजारिका ने अपनी किताब ‘मिजोरम : फ्रॉम बैटल फिल्ड टू बैलेट बॉक्स’पर चर्चा करते हुए कहा कि कैसे इस पूर्वोत्तर राज्य ने हिंसा और हथियारों के दौर को पीछे छोड़कर मतदान पेटी को अपनाया। 1980 के दशक की शुरुआत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में केंद्र सरकार और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के बीच शांति वार्ताओं की नींव रखी गई थी।

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हालांकि, राजनीतिक परिस्थितियों के कारण यह प्रक्रिया तब पूरी नहीं हो पाई। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में इस शांति प्रक्रिया को निर्णायक गति मिली। लंबी वार्ताओं के बाद केंद्र सरकार और एमएनएफ नेता लालडेंगा के बीच 30 जून 1986 को ऐतिहासिक मिजोरम शांति समझौता हुआ। इस समझौते के परिणामस्वरूप मिजोरम को भारत का 23वां पूर्ण राज्य घोषित किया गया। इसने दो दशकों से चले आ रहे खूनी संघर्ष पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया।
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लेखिका प्रीति गिल के साथ संवाद में संजय ने कहा कि मिजोरम के इतिहास में एक ऐसा दौर था जिसे स्थानीय लोग रंबुई यानी अशांति का समय कहते थे। 1960 के दशक में शुरू हुआ यह राजनीतिक असंतोष और अधिकारों की मांग का संघर्ष लगभग दो दशकों तक चला। इस दौरान सुरक्षा बलों, उग्रवादी संगठनों और आम नागरिकों के बीच उपजे हालात ने सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित किया। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समस्या का स्थायी समाधान बातचीत से ही संभव है और मिजोरम इसका एक जीवंत उदाहरण है।
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बंदूक छोड़कर मतदान पेटी को अपनाया
मिजोरम के लोगों और उनके नेताओं ने यह साबित किया कि लोकतंत्र की ताकत किसी भी हथियार से बड़ी होती है। समझौते के बाद उग्रवादियों ने अपने हथियार डाल दिए और मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गए। जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं, उन्होंने देश के भविष्य को गढ़ने के लिए मतदान पेटी को थामा।
 

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