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Kangra News: धर्मशाला में तिब्बत-इटली के 400 साल पुराने रिश्तों पर चर्चा
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धर्मशाला। इटली और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संबंधों की जड़ें 17वीं शताब्दी जितनी पुरानी हैं, जब इतालवी मिशनरियों ने ल्हासा की दुर्गम पहाड़ियों में पहुंकर तिब्बती भाषा और संस्कृति का अध्ययन किया था। यह तथ्य सोमवार को इटली के एमिलिया-रोमाग्ना क्षेत्रीय परिषद की सदस्य एलिसे पार्मा के धर्मशाला स्थित तिब्बती निर्वासित संसद के दौरे के दौरान सामाने आया।
एलिसे पार्मा के साथ ओसाना मातेओ भी मौजूद रहे। इस दौरान संसद के अध्यक्ष खेनपो सोनम तेनफेल और उपाध्यक्ष डोलमा सेरिंग तेयखांग के साथ हुई बैठक में उन ऐतिहासिक क्षणों को याद किया गया जब 17वीं और 18वीं शताब्दी में इतालवी जेसुइट और कैपचिन मिशनरियों ने ल्हासा की यात्रा की थी।
उन्होंने न केवल तिब्बती भाषा सीखी, बल्कि दुनिया के शुरुआती तिब्बती-इतालवी शब्दकोश भी तैयार किए थे। अध्यक्ष ने कहा कि इटली आज भी यूरोप में तिब्बत का समर्थक बना हुआ है। बैठक में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) ने चीन के साथ हुए कूटनीतिक प्रयासों का विवरण भी साझा किया। बैठक में बताया गया कि दलाई लामा के नेतृत्व में 2002 से 2010 के बीच चीन के साथ नौ दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला।
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चीन आज भी तिब्बतियों को अलगाववादी बताकर उनकी धार्मिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध लगा रहा है। तिब्बती बच्चों को जबरन औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूलों में भेजकर उन्हें उनकी मूल विरासत से अलग किया जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल को एशिया के जल संकट के प्रति भी आगाह किया गया।
बताया गया कि चीन तिब्बती नदियों पर विशालकाय बांध बनाकर जल संसाधनों पर एकाधिकार कर रहा है और तिब्बती पठार पर खनिजों का अनियंत्रित खनन पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। उपाध्यक्ष ने तिब्बती बच्चों (टीसीवी) की शिक्षा में सहयोग देने वाले इतालवी नागरिकों का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया।
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एलिसे पार्मा के साथ ओसाना मातेओ भी मौजूद रहे। इस दौरान संसद के अध्यक्ष खेनपो सोनम तेनफेल और उपाध्यक्ष डोलमा सेरिंग तेयखांग के साथ हुई बैठक में उन ऐतिहासिक क्षणों को याद किया गया जब 17वीं और 18वीं शताब्दी में इतालवी जेसुइट और कैपचिन मिशनरियों ने ल्हासा की यात्रा की थी।
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उन्होंने न केवल तिब्बती भाषा सीखी, बल्कि दुनिया के शुरुआती तिब्बती-इतालवी शब्दकोश भी तैयार किए थे। अध्यक्ष ने कहा कि इटली आज भी यूरोप में तिब्बत का समर्थक बना हुआ है। बैठक में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) ने चीन के साथ हुए कूटनीतिक प्रयासों का विवरण भी साझा किया। बैठक में बताया गया कि दलाई लामा के नेतृत्व में 2002 से 2010 के बीच चीन के साथ नौ दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला।
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चीन आज भी तिब्बतियों को अलगाववादी बताकर उनकी धार्मिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध लगा रहा है। तिब्बती बच्चों को जबरन औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूलों में भेजकर उन्हें उनकी मूल विरासत से अलग किया जा रहा है। प्रतिनिधिमंडल को एशिया के जल संकट के प्रति भी आगाह किया गया।
बताया गया कि चीन तिब्बती नदियों पर विशालकाय बांध बनाकर जल संसाधनों पर एकाधिकार कर रहा है और तिब्बती पठार पर खनिजों का अनियंत्रित खनन पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। उपाध्यक्ष ने तिब्बती बच्चों (टीसीवी) की शिक्षा में सहयोग देने वाले इतालवी नागरिकों का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया।