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अहंकार का त्याग ही ईश्वर की प्राप्ति : नदिया
Thu, 08 Jan 2026 08:25 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Thu, 08 Jan 2026 08:25 AM IST
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राजा का तालाब के कुठेहड़ में भागवत रहस्य कथा सुनते लोग। -स्रोत: आयोजक
राजा का तालाब (कांगड़ा)। जब तक मनुष्य को अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अहंकार रहता है, तब तक परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है। जिस क्षण जीव सर्वस्व त्याग कर प्रभु की शरणागति स्वीकार कर लेता है, उसी क्षण नारायण उसके दुखों का अंत कर देते हैं। यह विचार कुठेहड़ में आयोजित संकीर्तन एवं भागवत रहस्य कथा के दौरान मंगलवार को कथावाचक नदिया बिहारी दास ने व्यक्त किए।
उन्होंने गजेंद्र मोक्ष और भक्त प्रहलाद के प्रसंगों के माध्यम से भक्तों को भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाया। कथावाचक ने बताया कि गजेंद्र अपनी शक्ति के घमंड में वर्षों तक मगरमच्छ से लड़ता रहा, लेकिन जब वह पूरी तरह निर्बल हो गया, तब उसने अहंकार छोड़कर भगवान विष्णु को पुकारा। गजेंद्र की करुण पुकार सुनकर भगवान तुरंत गरुड़ पर सवार होकर आए और सुदर्शन चक्र से उसे मृत्यु के पाश से मुक्त किया। उन्होंने बताया कि सच्चा समर्पण ही ईश्वर को भक्त के पास आने पर विवश करता है।
इसके पश्चात उन्होंने भक्त प्रह्लाद के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद ने नारद मुनि की शिक्षाओं से विष्णु भक्ति को धारण किया। हिरण्यकश्यप के अहंकार और अत्याचारों के सामने प्रह्लाद की निष्काम भक्ति की जीत हुई। भगवान ने नरसिंह रूप धारण कर यह सिद्ध किया कि वे अपने भक्त की रक्षा के लिए हर कण में व्याप्त हैं।
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उन्होंने गजेंद्र मोक्ष और भक्त प्रहलाद के प्रसंगों के माध्यम से भक्तों को भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाया। कथावाचक ने बताया कि गजेंद्र अपनी शक्ति के घमंड में वर्षों तक मगरमच्छ से लड़ता रहा, लेकिन जब वह पूरी तरह निर्बल हो गया, तब उसने अहंकार छोड़कर भगवान विष्णु को पुकारा। गजेंद्र की करुण पुकार सुनकर भगवान तुरंत गरुड़ पर सवार होकर आए और सुदर्शन चक्र से उसे मृत्यु के पाश से मुक्त किया। उन्होंने बताया कि सच्चा समर्पण ही ईश्वर को भक्त के पास आने पर विवश करता है।
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इसके पश्चात उन्होंने भक्त प्रह्लाद के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद ने नारद मुनि की शिक्षाओं से विष्णु भक्ति को धारण किया। हिरण्यकश्यप के अहंकार और अत्याचारों के सामने प्रह्लाद की निष्काम भक्ति की जीत हुई। भगवान ने नरसिंह रूप धारण कर यह सिद्ध किया कि वे अपने भक्त की रक्षा के लिए हर कण में व्याप्त हैं।
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