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हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आठ साल की सेवा पर ग्रामीण विद्या उपासकों को नियमित करने का आदेश

Sat, 17 Oct 2026 05:15 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 17 Oct 2026 05:15 AM IST
सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूती देने वाले शिक्षकों के हक में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 

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HP High Court Major verdict : Order to regularize Gramin Vidya Upasaks upon completion of eight years of servi
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूती देने वाले शिक्षकों के हक में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि ग्रामीण विद्या उपासक के रूप में 8 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने वाले याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को नियमित किया जाए। उन्हें वरिष्ठता, वेतन वृद्धि तथा पदोन्नति सहित सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं। यह निर्णय न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने ओम प्रकाश एवं अन्य की ओर से दायर याचिका को स्वीकारते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं को शुरुआत में वर्ष 2001 से 2004 के बीच दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा गारंटी योजना और वैकल्पिक स्थान स्कूली शिक्षा केंद्रों को चलाने के लिए शिक्षा स्वयंसेवक/प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था।

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ये है पूरा मामला
वर्ष 2009 में, राज्य सरकार ने एक नीतिगत निर्णय लेते हुए 4 साल का अनुभव और बारहवीं कक्षा की योग्यता रखने वाले इन ईजीएस प्रशिक्षकों को अनुबंध के आधार पर ग्रामीण विद्या उपासक में परिवर्तित कर दिया था। इसके बाद सरकार ने 16 अगस्त 2011 को एक और निर्णय लिया, जिसके तहत 31 मार्च 2011 तक 8 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले ग्रामीण विद्या उपासकों को स्पेशल जेबीटी प्रमाणपत्र देकर नियमित शिक्षक बनाने का प्रावधान किया गया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनके सेवा परिवर्तन के बाद भी सरकार ने उन्हें तय 8 वर्षों के बजाय 11 से अधिक वर्षों के लंबे इंतजार के बाद (वर्ष 2021 में) नियमित किया। सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आवश्यक योग्यता (जैसे टेट पास होना) नहीं थी और वे कट-ऑफ तारीख के दायरे में नहीं आते थे। हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं ने 2001 से ही राज्य के सबसे कठिन और जनजातीय क्षेत्रों में बच्चों को शिक्षा देने का काम किया है। जब सरकार ने खुद एक नीति बनाकर उनके जैसे ही अन्य कर्मचारियों को 8 साल की सेवा के बाद स्पेशल जेबीटी प्रमाणपत्र देकर नियमित किया है, तो याचिकाकर्ताओं को इस लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

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मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर के सेवा विस्तार पर हाईकोर्ट की रोक
वहीं प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों को दिए जाने वाले सेवा विस्तार से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ता को राहत देते हुए स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी किए गए डॉक्टर के एक वर्षीय सेवा विस्तार के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने यह आदेश याचिकाकर्ता डॉ. अंजुम बाटुल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। अदालत ने राज्य सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सेवा विस्तार प्रतिवादी को दस्ती नोटिस के जरिेये जवाब तलब करने की अनुमति प्रदान की है।मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को होगी। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता 2013 से 2018 तक डॉ. आरपीजीएमसी टांडा (कांगड़ा) के फिजियोलॉजी विभाग में सीनियर रेजीडेंट रहीं और 2018 से 2020 तक डॉ. आरकेजीएमसी हमीरपुर में अनुबंध पर सहायक प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं।

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हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से चयन के बाद 10 जनवरी 2020 को उन्हें डॉ. आरकेजीएमसी हमीरपुर में नियमित सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया गया तथा उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नामित किया गया। वर्ष 2024 में वह इस पद पर नियमित पदोन्नति पाने के लिए पूरी तरह पात्र हो चुकी थीं। 31 अगस्त 2026 को प्रतिवादी के सेवानिवृत्त होने पर एसोसिएट प्रोफेसर का पद रिक्त हुआ था। लेकिन सरकार ने 29 जुलाई 2026 को अधिसूचना जारी कर प्रतिवादी को 1 सितंबर 2026 से 31 अगस्त 2027 तक एक वर्ष का सेवा विस्तार दे दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार करने के बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रतिवादी को दिए गए एक वर्ष के सेवा विस्तार के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।

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