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Himachal: हिमाचल की 80 औषधीय वनस्पतियां डायबिटीज पर असरदार, परीक्षण में खुलासा

Sun, 05 Jul 2026 04:50 PM IST
Krishan Singh हर्षित शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
हर्षित शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sun, 05 Jul 2026 04:50 PM IST
सार

 पर्वतीय जैव विविधता अब वैश्विक चिकित्सा अनुसंधान का केंद्र बन रही है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में हिमालय की 80 औषधीय वनस्पतियों में मधुमेह नियंत्रण की मजबूत क्षमता सामने आई है। 

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Himachal: Study reveals 80 medicinal plants from Himachal are effective against diabetes.
डायबिटीज - फोटो : Freepik.com

विस्तार

हिमाचल प्रदेश की पर्वतीय जैव विविधता अब वैश्विक चिकित्सा अनुसंधान का केंद्र बन रही है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में हिमालय की 80 औषधीय वनस्पतियों में मधुमेह नियंत्रण की मजबूत क्षमता सामने आई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन पौधों में मौजूद प्राकृतिक यौगिक भविष्य में नई हर्बल दवाओं के विकास का आधार बन सकते हैं। यह अध्ययन किसी एक प्रयोग पर आधारित नहीं, बल्कि तीन दशक के वैज्ञानिक शोधों की समीक्षा है। इसमें पांच देशों के वैज्ञानिकों ने पारंपरिक औषधीय वनस्पतियों की क्षमता परखी। शोधकर्ताओं ने 1995 से 2025 के बीच प्रकाशित अध्ययनों का विश्लेषण और प्रजातियों पर दोबारा परीक्षण किया है।

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प्रदेश को अध्ययन का केंद्र इसलिए बनाया गया, क्योंकि यहां औषधीय पौधों की असाधारण जैव विविधता है। अध्ययन में दावा किया गया है कि देश की आयुर्वेदिक फार्माकोपिया (औषध संहिता) में शामिल 350 औषधीय पौधों में से 225 प्रजातियां हिमाचल प्रदेश में पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने इन प्रजातियों पर उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों की समीक्षा की। विस्तृत विश्लेषण के बाद 80 एथनोमेडिसिनल (पारंपरिक उपचार) प्रजातियों की पहचान हुई, जिनमें मधुमेह नियंत्रण के सबसे मजबूत वैज्ञानिक और प्रीक्लीनिकल प्रमाण मिले। इन्हीं 80 प्रजातियों को अध्ययन का मुख्य आधार बनाया गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इन पौधों की वास्तविक चिकित्सीय प्रभावशीलता की पुष्टि के लिए मनुष्य पर बड़े स्तर के क्लीनिकल परीक्षण अभी आवश्यक हैं। 

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मधुमेह नियंत्रण वाली प्रमुख हिमाचली प्रजातियां

अध्ययन में कुटकी (पिक्रोरिजा कुर्रोआ), चिरायता (स्वर्टिया चिरायता), अतीस (एकोनिटम हेटेरोफिलम), दारुहल्दी (बर्बेरिस एरिस्टाटा), रॉयलिया (रॉयलिया सिनेरिया) और बुरांश (रोडोडेंड्रोन आर्बोरियम) जैसी कई औषधीय प्रजातियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया। जुनिपर, ओगला/कुट्टू, कालमेघ, गुरमार, गिलोय, अश्वगंधा, अर्जुन, ब्राह्मी, नागफनी और रीठा भी इनमें शामिल हैं।

क्यों कारगर हैं पौधे

इन पौधों की सबसे बड़ी ताकत इनके प्राकृतिक जैव सक्रिय यौगिक हैं। इनमें फ्लेवोनोइड, एल्कलॉइड, फिनोल, सैपोनिन, टरपेनोइड, टैनिन, ग्लाइकोसाइड और पॉलीफेनोल प्रमुख हैं। ये तत्व शरीर में अलग-अलग स्तर पर काम करते हैं। कुछ यौगिक अग्नाशय की बीटा कोशिकाओं को सक्रिय रखने में मदद कर सकते हैं। कुछ इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर बना सकते हैं। कई यौगिक भोजन के बाद रक्त में शर्करा बढ़ने की गति धीमी कर सकते हैं। कुछ तत्व कोशिकाओं में ग्लूकोज के बेहतर उपयोग में सहायता करते हैं। राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल छोटा शिमला की चिकित्सा अधीक्षक अंबिका खागटा ने बताया कि इन औषधीय ताकतों का आयुर्वेद में वर्णन है। इनका उपयोग अभी भी किया जा रहा है।

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एक साथ आए पांच देशों के आठ संस्थानों के वैज्ञानिक शोध में शूलिनी यूनिवर्सिटी सोलन की महक ठाकुर, सौरभ वर्मा, भावना ठाकुर और तन्मय शर्मा शामिल रहे। ग्राफिक एरा डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी से देवेंद्र उप्रेती ने योगदान दिया। यूनिवर्सिटी ऑफ डेब्रेसेन हंगरी से भवनीश कुमार, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यीरेजहाजा हंगरी से इवा हॉजिनोवा, यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर इन क्राको पोलैंड से अभिषेक शर्मा, यूनाइटेड अरब अमीरात यूनिवर्सिटी के मोहम्मद जिदान ने अध्ययन में योगदान दिया और अमेरिका से स्वतंत्र शोधकर्ता अली अबू-ओदेह भी शोध दल में शामिल रहे।

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