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Yamuna Nagar News: सहारनपुर की कारीगरी से मीराबाई बाजार की पहचान
Thu, 01 Feb 2024 02:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Thu, 01 Feb 2024 02:45 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी और जूते तैयार करने में सहारनपुर की कारीगरी का जवाब नहीं। तभी तो तीन दशक से यमुनानगर के दुकानदार और ग्राहक इसके मुरीद हैं। इसी से यहां के सबसे बड़े मीराबाई बाजार की पहचान है, जहां सहारनपुर में तैयार गर्मियों-सर्दियों के लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी और जूतों की खास मांग है।
इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन औसतन इन सामानों का सात लाख का कारोबार होता है, जबकि त्योहार और शादी सीजन में यह करोड़ में पहुंच जाता है। दरअसल, मीराबाई बाजार में 35 वर्ष पहले लोगों को टीन-टप्पर के खोखे अलॉट हुए थे, जो अब बड़ी-बड़ी दुकानों और माॅल का रूप ले चुके हैं।
फिलहाल यहां कई बड़े शोरूम व मॉल के साथ ही लगभग 500 दुकानें हैं, जहां बच्चों से बुजर्गों तक हर आयु वर्ग के डिजाइनर कपड़ों संग फल-सब्जी और अन्य आवश्यकता की वस्तुएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा बच्चों के खिलौने और महिलाओं के कॉस्मेटिक की भी यहां बेहतर रेंज उपलब्ध है। मीराबाई बाजार में न सिर्फ यमुनानगर और जगाधरी बल्कि पूरे जिले के गांवों से भी लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं, जिसमें सबसे ज्यादा मांग सहारनपुर से तैयार होकर आए लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी व जूतों की ही रहती है।
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कुल कारोबार का 30 फीसद से अधिक सहारनपुर के सामान से
दुकानदार राजकुमार ने बताया कि कोई दो राय नहीं कि बाजार को पहचान दिलाने में सहारनपुर के उद्योगपतियों और व्यापारियों का अहम योगदान है। बाजार के कुल कारोबार में 30 फीसद से अधिक योगदान सहारनपुर से आए सामान से है। खास तौर पर सहारनपुर में तैयार लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी व जूते बाजार में आ रहे हैं। यह सामान सहारनपुर के उद्योगपति व व्यापारी शुरुआत से अब तक बाजार के दुकानदारों को उधार में भी उपलब्ध करा रहे हैं।
मीराबाई बाजार एसोसिएशन के प्रधान प्रेम शर्मा ने बताया कि बाजार का नाम भी नहीं पड़ा था, तब सहारनपुर के जाटव नगर निवासी राम सिंह की बाजार में फौजी शू रिपेयर हाउस के नाम से दुकान थी। राम सिंह पूरे जिले में इकलौते ऐसे कारीगर थे, जो पैर का आकार लेकर जूते तैयार करते थे। इसलिए पूरे जिले से लोग रामसिंह से जूते बनवाने आते थे और साथ ही बाजार से कपड़े और अन्य सामान भी ले जाते थे, जिससे बाजार का नाम होने लगा। आज तक भी लोग फौजी शू वाले की दुकान कहां है, ये पूछते हैं।
पिता ने 17 और खुद ने 23 साल किया काम, रेडीमेड के बढ़ते चलन से अब छोड़ा कार्य
सहारनपुर के जाटव नगर निवासी रामसिंह के बेटे जेआर मार्शल ने बताया कि पिता रामसिंह ने यमुनानगर (मीराबाई बाजार) में वर्ष 1982 में काम शुरू किया। तब वो इकलौते थे, जो यमुनानगर में पैर का आकार लेकर जूते बनाते थे। इसलिए उनसे पेपर मिल के काम करने वाले, जगाधरी के बर्तन व यमुनानगर के प्लाई व अन्य उद्योगों के व्यापारी जूते बनवाने लगे। धीरे-धीरे उनका नाम हुआ तो हर वर्ग के लोग जूते बनवाने लगे। इस तरह लगातार 17 वर्षों तक यह काम करने के बाद 1999 में पिता का देहांत हो गया। पिता से उन्होंने यह काम खुद भी सीख लिया था, इसलिए वर्ष 2022 तक खुद भी दुकान चलाई। फिर रेडीमेड जूतों के अधिक चलन देख यह कार्य बंद कर दिया।
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यमुनानगर। लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी और जूते तैयार करने में सहारनपुर की कारीगरी का जवाब नहीं। तभी तो तीन दशक से यमुनानगर के दुकानदार और ग्राहक इसके मुरीद हैं। इसी से यहां के सबसे बड़े मीराबाई बाजार की पहचान है, जहां सहारनपुर में तैयार गर्मियों-सर्दियों के लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी और जूतों की खास मांग है।
इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन औसतन इन सामानों का सात लाख का कारोबार होता है, जबकि त्योहार और शादी सीजन में यह करोड़ में पहुंच जाता है। दरअसल, मीराबाई बाजार में 35 वर्ष पहले लोगों को टीन-टप्पर के खोखे अलॉट हुए थे, जो अब बड़ी-बड़ी दुकानों और माॅल का रूप ले चुके हैं।
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फिलहाल यहां कई बड़े शोरूम व मॉल के साथ ही लगभग 500 दुकानें हैं, जहां बच्चों से बुजर्गों तक हर आयु वर्ग के डिजाइनर कपड़ों संग फल-सब्जी और अन्य आवश्यकता की वस्तुएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा बच्चों के खिलौने और महिलाओं के कॉस्मेटिक की भी यहां बेहतर रेंज उपलब्ध है। मीराबाई बाजार में न सिर्फ यमुनानगर और जगाधरी बल्कि पूरे जिले के गांवों से भी लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं, जिसमें सबसे ज्यादा मांग सहारनपुर से तैयार होकर आए लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी व जूतों की ही रहती है।
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कुल कारोबार का 30 फीसद से अधिक सहारनपुर के सामान से
दुकानदार राजकुमार ने बताया कि कोई दो राय नहीं कि बाजार को पहचान दिलाने में सहारनपुर के उद्योगपतियों और व्यापारियों का अहम योगदान है। बाजार के कुल कारोबार में 30 फीसद से अधिक योगदान सहारनपुर से आए सामान से है। खास तौर पर सहारनपुर में तैयार लेडीज सूट, लहंगे, कोट-पैंट, शेरवानी व जूते बाजार में आ रहे हैं। यह सामान सहारनपुर के उद्योगपति व व्यापारी शुरुआत से अब तक बाजार के दुकानदारों को उधार में भी उपलब्ध करा रहे हैं।
मीराबाई बाजार एसोसिएशन के प्रधान प्रेम शर्मा ने बताया कि बाजार का नाम भी नहीं पड़ा था, तब सहारनपुर के जाटव नगर निवासी राम सिंह की बाजार में फौजी शू रिपेयर हाउस के नाम से दुकान थी। राम सिंह पूरे जिले में इकलौते ऐसे कारीगर थे, जो पैर का आकार लेकर जूते तैयार करते थे। इसलिए पूरे जिले से लोग रामसिंह से जूते बनवाने आते थे और साथ ही बाजार से कपड़े और अन्य सामान भी ले जाते थे, जिससे बाजार का नाम होने लगा। आज तक भी लोग फौजी शू वाले की दुकान कहां है, ये पूछते हैं।
पिता ने 17 और खुद ने 23 साल किया काम, रेडीमेड के बढ़ते चलन से अब छोड़ा कार्य
सहारनपुर के जाटव नगर निवासी रामसिंह के बेटे जेआर मार्शल ने बताया कि पिता रामसिंह ने यमुनानगर (मीराबाई बाजार) में वर्ष 1982 में काम शुरू किया। तब वो इकलौते थे, जो यमुनानगर में पैर का आकार लेकर जूते बनाते थे। इसलिए उनसे पेपर मिल के काम करने वाले, जगाधरी के बर्तन व यमुनानगर के प्लाई व अन्य उद्योगों के व्यापारी जूते बनवाने लगे। धीरे-धीरे उनका नाम हुआ तो हर वर्ग के लोग जूते बनवाने लगे। इस तरह लगातार 17 वर्षों तक यह काम करने के बाद 1999 में पिता का देहांत हो गया। पिता से उन्होंने यह काम खुद भी सीख लिया था, इसलिए वर्ष 2022 तक खुद भी दुकान चलाई। फिर रेडीमेड जूतों के अधिक चलन देख यह कार्य बंद कर दिया।