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जड़ी-बूटियों के पौधों की तरफ बढ़ा रुझान
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हर्बल पार्क में उगाए जा रहे जड़ी बूटी के पौधे। संवाद
- फोटो : Yamuna Nagar
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संवाद न्यूज एजेंसी
प्रतापनगर। कोरोना काल के बाद जिले में जड़ी-बूटी के पौधों की तरफ लोगों का रुझान बढ़ रहा है। चुहड़पुर कलां स्थित ताऊ देवीलाल हर्बल पार्क में में एक सप्ताह में पांच लाख रुपये के पौधे बिक चुके हैं। पिछले महीने भी हर्बल खेती करने के इच्छुक किसानों ने लगभग 80 हजार रुपये के पौधों की खरीद की थी।
हरियाणा का एकमात्र हर्बल पार्क चुहड़पुर कलां में बना हुआ है। यहां 184 एकड़ भूमि में लगभग 350 किस्म की जड़ी-बूटियां लगी हैं। यहां लगे औषधियों के पौधों की हरियाणा के साथ-साथ कई प्रदेशों में काफी मांग रहती है। हर्बल पार्क के वन रक्षक दीपक का कहना है कि यहां लाखों की तादाद में जड़ी-बूटियों की नर्सरी लगाई गई है। यहां की जड़ी-बूटियों की कई प्रदेशों में खूब मांग है। उन्होंने बताया कि इस महीने अभी तक लगभग 5 लाख रुपये की कीमत की जड़ी-बूटियों के पौधों की बिक्री हो चुकी है। काफी संख्या में पौधे पानीपत के अंदर वन विभाग द्वारा खाली कराई गई 500 एकड़ भूमि में भी लगाए जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि पिछले महीने भी लगभग 80 हजार रुपये की कीमत के पौधों की बिक्री की गए थी। उन्होंने बताया कि लोगों में हर्बल की खेती करने के प्रति काफी उत्साह बढ़ा है। जिले के किसानों में भी परंपरागत खेती के साथ-साथ हर्बल की खेती करनी शुरू कर दी है। इससे किसानों की आय में काफी बढ़ोतरी होगी। जो जड़ी-बूटियां इस हर्बल पार्क में मिल जाती हैं, वह अन्य कहीं भी नहीं मिलती। यहां दूर-दूर से लोग जड़ी-बूटी की खेती देखने और पार्क में घूमने आते हैं।
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वर्ष 2003 में शुरू हुआ था हर्बल पार्क
इस पार्क की नींव हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने जननायक देवीलाल के नाम पर छह नवंबर 2001 को रखी थी। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय अब्दुल कलाम ने वर्ष 2003 में किया था। उन्होंने यहां पर रुद्राक्ष का पौधा भी रोपित किया था, जो अब पेड़ बन चुका है। यह हर्बल नेचुरल पार्क 184 एकड़ में है। इस हर्बल नेचर पार्क में रुद्राक्ष, पत्थरचट, नागफनी, बेलपत्र, नीम, अश्वगंधा, जोड़तोड, करकरा, फनी सहित करीब 350 जड़ी-बूटियां हर साल उगाई जाती हैं। इसके अलावा सिकाकाई, अश्वगंधा, तुलसी, मरवा, छुई मुई, शतावरी, बेहड़ा, तेज पत्र, पिलखन, ग्वार पाठा, सर्पगंधा, पुत्रन जीवा, काला बांसा, गोंद कतीरा, सफेद चंदन, हार शृंगार, बड़ी इलायची, सदाबहार समेत सैकड़ों दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी पैदा की जा रही है।
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प्रतापनगर। कोरोना काल के बाद जिले में जड़ी-बूटी के पौधों की तरफ लोगों का रुझान बढ़ रहा है। चुहड़पुर कलां स्थित ताऊ देवीलाल हर्बल पार्क में में एक सप्ताह में पांच लाख रुपये के पौधे बिक चुके हैं। पिछले महीने भी हर्बल खेती करने के इच्छुक किसानों ने लगभग 80 हजार रुपये के पौधों की खरीद की थी।
हरियाणा का एकमात्र हर्बल पार्क चुहड़पुर कलां में बना हुआ है। यहां 184 एकड़ भूमि में लगभग 350 किस्म की जड़ी-बूटियां लगी हैं। यहां लगे औषधियों के पौधों की हरियाणा के साथ-साथ कई प्रदेशों में काफी मांग रहती है। हर्बल पार्क के वन रक्षक दीपक का कहना है कि यहां लाखों की तादाद में जड़ी-बूटियों की नर्सरी लगाई गई है। यहां की जड़ी-बूटियों की कई प्रदेशों में खूब मांग है। उन्होंने बताया कि इस महीने अभी तक लगभग 5 लाख रुपये की कीमत की जड़ी-बूटियों के पौधों की बिक्री हो चुकी है। काफी संख्या में पौधे पानीपत के अंदर वन विभाग द्वारा खाली कराई गई 500 एकड़ भूमि में भी लगाए जा रहे हैं।
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उन्होंने बताया कि पिछले महीने भी लगभग 80 हजार रुपये की कीमत के पौधों की बिक्री की गए थी। उन्होंने बताया कि लोगों में हर्बल की खेती करने के प्रति काफी उत्साह बढ़ा है। जिले के किसानों में भी परंपरागत खेती के साथ-साथ हर्बल की खेती करनी शुरू कर दी है। इससे किसानों की आय में काफी बढ़ोतरी होगी। जो जड़ी-बूटियां इस हर्बल पार्क में मिल जाती हैं, वह अन्य कहीं भी नहीं मिलती। यहां दूर-दूर से लोग जड़ी-बूटी की खेती देखने और पार्क में घूमने आते हैं।
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वर्ष 2003 में शुरू हुआ था हर्बल पार्क
इस पार्क की नींव हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने जननायक देवीलाल के नाम पर छह नवंबर 2001 को रखी थी। इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय अब्दुल कलाम ने वर्ष 2003 में किया था। उन्होंने यहां पर रुद्राक्ष का पौधा भी रोपित किया था, जो अब पेड़ बन चुका है। यह हर्बल नेचुरल पार्क 184 एकड़ में है। इस हर्बल नेचर पार्क में रुद्राक्ष, पत्थरचट, नागफनी, बेलपत्र, नीम, अश्वगंधा, जोड़तोड, करकरा, फनी सहित करीब 350 जड़ी-बूटियां हर साल उगाई जाती हैं। इसके अलावा सिकाकाई, अश्वगंधा, तुलसी, मरवा, छुई मुई, शतावरी, बेहड़ा, तेज पत्र, पिलखन, ग्वार पाठा, सर्पगंधा, पुत्रन जीवा, काला बांसा, गोंद कतीरा, सफेद चंदन, हार शृंगार, बड़ी इलायची, सदाबहार समेत सैकड़ों दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी पैदा की जा रही है।