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Yamuna Nagar News: उपभोक्ता को बीमे की राशि के साथ मुआवजा भी दे कंपनी
Tue, 02 Jun 2026 01:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Tue, 02 Jun 2026 01:10 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिला उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को बीमाधारक का चिकित्सा दावा अस्वीकार करने के मामले में सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी माना है। आयोग ने कंपनी को शिकायतकर्ता मुकेश कुमार मदान को 6905 रुपये की दावा राशि पर ब्याज सहित भुगतान करने तथा मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 22 हजार रुपये अतिरिक्त देने के आदेश दिए हैं।
आयोग के सहायक रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने बताया कि शिकायतकर्ता शहर की कृष्णा कॉलोनी निवासी मुकेश कुमार मदान ने आयोग में दायर याचिका में बताया कि उन्होंने विदेश यात्रा के लिए ओवरसीज मेडिक्लेम बिजनेस एंड हॉलीडे पॉलिसी खरीदी थी, जो 13 जनवरी 2019 से 11 जुलाई 2019 तक प्रभावी थी।
अमेरिका प्रवास के दौरान मई 2019 में उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें फ्लोरिडा स्थित जेएफके मेडिकल सेंटर में भर्ती कर उपचार कराना पड़ा। उपचार के बाद उन्होंने बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया, लेकिन कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि उन्होंने पॉलिसी लेते समय थैलेसीमिया माइनर और उच्च रक्तचाप बीमारियों की जानकारी नहीं दी थी।
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सुनवाई के दौरान आयोग ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि बीमा पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी द्वारा शिकायतकर्ता की चिकित्सकीय जांच कराई गई थी तथा उपलब्ध रिपोर्टों में केवल थैलेसीमिया ट्रेट की संभावना व्यक्त की गई थी।
आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी लेने से पहले थैलेसीमिया माइनर होने की जानकारी थी या उन्होंने जानबूझकर कोई तथ्य छिपाया था। आयोग ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि थैलेसीमिया माइनर एक आनुवंशिक स्थिति है, न कि सामान्य अर्थों में बीमारी।
साथ ही भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार आनुवंशिक विकारों के आधार पर स्वास्थ्य बीमा दावों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। आयोग ने माना कि बीमा कंपनी शिकायत के समय अनुबंध से पीछे हटने का प्रयास कर रही थी और दावा अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी।
हालांकि आयोग ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने अस्पताल के पूरे बिल का भुगतान नहीं किया था। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने केवल दवाओं के तीन बिलों का भुगतान किया था। अस्पताल ने शेष राशि पर वित्तीय सहायता एवं चैरिटी राइट-ऑफ लागू कर दिया था। इसलिए आयोग ने केवल भुगतान की गई राशि 96.96 अमेरिकी डॉलर, जो लगभग 6905 रुपये बनती है, के भुगतान का आदेश दिया।
आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को उक्त राशि पर शिकायत दायर करने की तिथि से भुगतान तक सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज दे। साथ ही मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 22 हजार रुपये एकमुश्त अदा करे। आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करने को कहा गया है, अन्यथा देय राशि पर नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
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यमुनानगर। जिला उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को बीमाधारक का चिकित्सा दावा अस्वीकार करने के मामले में सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी माना है। आयोग ने कंपनी को शिकायतकर्ता मुकेश कुमार मदान को 6905 रुपये की दावा राशि पर ब्याज सहित भुगतान करने तथा मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 22 हजार रुपये अतिरिक्त देने के आदेश दिए हैं।
आयोग के सहायक रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने बताया कि शिकायतकर्ता शहर की कृष्णा कॉलोनी निवासी मुकेश कुमार मदान ने आयोग में दायर याचिका में बताया कि उन्होंने विदेश यात्रा के लिए ओवरसीज मेडिक्लेम बिजनेस एंड हॉलीडे पॉलिसी खरीदी थी, जो 13 जनवरी 2019 से 11 जुलाई 2019 तक प्रभावी थी।
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अमेरिका प्रवास के दौरान मई 2019 में उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें फ्लोरिडा स्थित जेएफके मेडिकल सेंटर में भर्ती कर उपचार कराना पड़ा। उपचार के बाद उन्होंने बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया, लेकिन कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि उन्होंने पॉलिसी लेते समय थैलेसीमिया माइनर और उच्च रक्तचाप बीमारियों की जानकारी नहीं दी थी।
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सुनवाई के दौरान आयोग ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि बीमा पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी द्वारा शिकायतकर्ता की चिकित्सकीय जांच कराई गई थी तथा उपलब्ध रिपोर्टों में केवल थैलेसीमिया ट्रेट की संभावना व्यक्त की गई थी।
आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी लेने से पहले थैलेसीमिया माइनर होने की जानकारी थी या उन्होंने जानबूझकर कोई तथ्य छिपाया था। आयोग ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि थैलेसीमिया माइनर एक आनुवंशिक स्थिति है, न कि सामान्य अर्थों में बीमारी।
साथ ही भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार आनुवंशिक विकारों के आधार पर स्वास्थ्य बीमा दावों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। आयोग ने माना कि बीमा कंपनी शिकायत के समय अनुबंध से पीछे हटने का प्रयास कर रही थी और दावा अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी।
हालांकि आयोग ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने अस्पताल के पूरे बिल का भुगतान नहीं किया था। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने केवल दवाओं के तीन बिलों का भुगतान किया था। अस्पताल ने शेष राशि पर वित्तीय सहायता एवं चैरिटी राइट-ऑफ लागू कर दिया था। इसलिए आयोग ने केवल भुगतान की गई राशि 96.96 अमेरिकी डॉलर, जो लगभग 6905 रुपये बनती है, के भुगतान का आदेश दिया।
आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को उक्त राशि पर शिकायत दायर करने की तिथि से भुगतान तक सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज दे। साथ ही मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 22 हजार रुपये एकमुश्त अदा करे। आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करने को कहा गया है, अन्यथा देय राशि पर नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।