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Yamuna Nagar News: हक के लिए करना पड़ रहा संघर्ष
Thu, 13 Feb 2025 12:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Thu, 13 Feb 2025 12:38 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। भारतीय संस्कृति व परंपरा में स्त्री को शक्ति स्वरूपा कहा गया है। हमारी संस्कृति में स्त्री पूजा का विधान है। बावजूद इसके हमारे देश में महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है। विश्व को स्त्री सम्मान का ज्ञान देने वाले देश भारत में महिलाओं को अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
आधुनिक शिक्षा व तकनीकी के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं आया है। आज भी उन्हें स्वयं को साबित करने के लिए दूसरों से मौका पाने का मोहताज होना पड़ता है। यह हालात तब है जबकि देश की महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। हालांकि सरकार महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम व योजनाएं चला रही हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
छोटे शहरों व गांवों में महिलाओं को आज भी बंदिशों में रखा जाता है। क्षमता होने के बाद भी उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं। कार्य क्षेत्रों में भी महिलाओं को कम आंका जाता है। राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं ने अपने विचार व अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ मानसिकता में भी बदलाव लाना जरूरी है। पहले स्वयं फिर परिवार से इसकी शुरुआत करने की आवश्यकता है।
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अनीता खुल्लर ने कहा कि महिलाओं की स्थिति सुधारना सरकार के साथ हर एक व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है। इसके लिए बेटा-बेटी को एक समान समझना चाहिए। परिवार में महिलाओं को अहमियत देनी चाहिए। परिवार में महत्व मिलने से बेटियों में आत्मविश्वास बढ़ेगा।
शिखा ने कहा कि परिवार में अक्सर बेटियों को सामाजिक शिक्षा दी जाती है। परंतु बेटों को कभी उनका दायरा या मर्यादा के बारे नहीं बताया जाता है।बेटियों से ज्यादा बेटों को इस शिक्षा की जरूरत है। चूंकि महिलाओं के प्रति अपराधों में पुरुष होते हैं। पुरुषों उनकी नजर में महिला का दर्जा दोयम है।
शिक्षिका रेणुका शर्मा ने कहा कि बेटा-बेटी को एक समान देखें। जिस तरह व्यापार व कारोबार में बेटों का सहयोग लिया जाता है, उसी तरह बेटियों को बढ़ावा दें। इससे वे आत्मनिर्भर बनेगी। जब महिलाएं आर्थिक रूप से संपन्न होंगी तो धीरे-धीरे पुरुष प्रधान मानसिकता में बदलाव आएगा।
विद्यालय प्राचार्या प्रतीक्षा रानी ने कहा कि महिलाओं के प्रति मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी महिलाओं को स्वयं निर्णय लेने की आजादी नहीं मिल पाई है। परिवार के निर्णय पर ही महिलाओं को आंका जाता है। हमें सबसे पहले मानसिकता में बदलाव लाना होगा।
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जगाधरी। भारतीय संस्कृति व परंपरा में स्त्री को शक्ति स्वरूपा कहा गया है। हमारी संस्कृति में स्त्री पूजा का विधान है। बावजूद इसके हमारे देश में महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है। विश्व को स्त्री सम्मान का ज्ञान देने वाले देश भारत में महिलाओं को अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
आधुनिक शिक्षा व तकनीकी के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कोई ज्यादा सुधार नहीं आया है। आज भी उन्हें स्वयं को साबित करने के लिए दूसरों से मौका पाने का मोहताज होना पड़ता है। यह हालात तब है जबकि देश की महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। हालांकि सरकार महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम व योजनाएं चला रही हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
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छोटे शहरों व गांवों में महिलाओं को आज भी बंदिशों में रखा जाता है। क्षमता होने के बाद भी उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं। कार्य क्षेत्रों में भी महिलाओं को कम आंका जाता है। राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं ने अपने विचार व अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ मानसिकता में भी बदलाव लाना जरूरी है। पहले स्वयं फिर परिवार से इसकी शुरुआत करने की आवश्यकता है।
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अनीता खुल्लर ने कहा कि महिलाओं की स्थिति सुधारना सरकार के साथ हर एक व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है। इसके लिए बेटा-बेटी को एक समान समझना चाहिए। परिवार में महिलाओं को अहमियत देनी चाहिए। परिवार में महत्व मिलने से बेटियों में आत्मविश्वास बढ़ेगा।
शिखा ने कहा कि परिवार में अक्सर बेटियों को सामाजिक शिक्षा दी जाती है। परंतु बेटों को कभी उनका दायरा या मर्यादा के बारे नहीं बताया जाता है।बेटियों से ज्यादा बेटों को इस शिक्षा की जरूरत है। चूंकि महिलाओं के प्रति अपराधों में पुरुष होते हैं। पुरुषों उनकी नजर में महिला का दर्जा दोयम है।
शिक्षिका रेणुका शर्मा ने कहा कि बेटा-बेटी को एक समान देखें। जिस तरह व्यापार व कारोबार में बेटों का सहयोग लिया जाता है, उसी तरह बेटियों को बढ़ावा दें। इससे वे आत्मनिर्भर बनेगी। जब महिलाएं आर्थिक रूप से संपन्न होंगी तो धीरे-धीरे पुरुष प्रधान मानसिकता में बदलाव आएगा।
विद्यालय प्राचार्या प्रतीक्षा रानी ने कहा कि महिलाओं के प्रति मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी महिलाओं को स्वयं निर्णय लेने की आजादी नहीं मिल पाई है। परिवार के निर्णय पर ही महिलाओं को आंका जाता है। हमें सबसे पहले मानसिकता में बदलाव लाना होगा।