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हंसों ने करवाई नल-दमयंती की शादी

Sat, 28 Sep 2013 12:38 AM IST
कुरुक्षेत्र
कुरुक्षेत्र Updated Sat, 28 Sep 2013 12:38 AM IST
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Swans introduced by tap - Damayanti's marriage
कुरुक्षेत्र के मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद और मैक कुरुक्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय सांग उत्सव के पहले दिन हिसार के सांगी धर्मवीर ने गुरु धनपत के लिखे सांग नल दमयंती का मंचन किया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि केयू जनसंचार एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर एसएस बूरा ने दीप प्रज्ज्वलित कर की।
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इस अवसर पर उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद के कार्यक्रम अधिकारी राजेद्र और मैक उपनिदेशक विश्व दीपक त्रिखा ने भी दीप प्रज्वलन में सहयोग दिया। मंच संचालन मैक समन्वयक वीरेंद्र न किया। सांग में नल और दमयंती के प्रेम प्रसंग से लोगों को अवगत करवाया गया।
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सांग में दिखाया कि निसद प्रांत के राजा वीरसेन के एक पुत्र नल है। नल का पढ़ने में बिल्कुल मन नहीं होता, और वह जुआ खेलने की आदत में पड़ जाता है। नल की इस आदत से परेशान राजा वीरसेन नल के लिए कोई अच्छी लड़की ढूंढ कर उसका विवाह करना चाहते हैं, ताकि गृहस्थी में पड़ने के कारण नल जुआ खेलने की आदत छोड़ दे। किंतु नल विवाह से मना कर देता है।
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वहीं विदर्भ प्रांत के राजा भीमसेन की पुत्री दमयंती भी विवाह नहीं करना चाहती। दमयंती को हंस पालने का शौक होता है। एक दिन दमयंती का हंस उड़कर राजकुमार नल के पास चला जाता है। नल हंस को पकड़ लेता है और उसे जुए में दांव पर लगा देता है। हंस नल से रहम की भीख मांगता हैं।

नल हंस पर दया करके हंस को छोड़ देता है। हंस नल से कहता है कि मैं तुम्हारा विवाह राजा भीमसेन की पुत्री दमयंती से करवाऊंगा। हंस राजकुमार नल के बारे में राजा भीमसेन को बताते हैं। राजा भीमसेन दमयंती का स्वयंवर रचते हैं। स्वयंवर में इंद्र, अग्नी, वायु, यमराज तथा कलयुग आदि भी देवता भी आते हैं। राजकुमार नल भी स्वयंवर में पहुंचता है। राजकुमार नल दमयंती को स्वयंवर में जीत लेता है।

देवराज इंद्र नल तथा दमयंती को एक पुत्र तथा एक पुत्री का वरदान देता है, किंतु कलयुग इस शादी से नाराज हो जाता है। वह दोनों को श्राप देता है कि उन्हें संतान सुख नहीं मिलेगा। दोनो 12 वर्ष तक एक दूसरे से अलग रहेंगे। तब देवराज इंद्र कलयुग को अपने वरदान के बारे में बताते हैं। कलयुग कहता है कि उसका श्राप भी निष्फल नहीं जाएगा। इसलिए 12 वर्ष तक नल तथा दमयंती को औलाद नहीं होगी।

धीरे-धीरे समय बीतने लगता है। एक दिन नल का चचेरा भाई पुष्कर राजकुमार नल से जुआ खेलने की बात करता है। राजकुमार नल जुआ खेलने को तैयार हो जाते हैं। कलयुग पुष्कर की मदद करता है और नल जुए में अपना सब कुछ हार जाता है। 12 वर्ष बीत जाते हैं। राजा नल को एक पुत्र तथा एक पुत्री की प्राप्ति होती है, जिसका नाम इंद्रनील तथा इंद्रावती रखा जाता है। राजकुमार नल का चचेरा भाई पुष्कर कलयुग की बातों में आकर नल को उसके परिवार सहित निकाल देता है।

नल अपनी पत्नी दमयंती को उनके बच्चों सहित उसके पिता के घर भेज देता है। और स्वयं राजा रितुपर्ण की घुड़साल में काम करने लग जाता है। कुछ वर्ष बीतने के बाद राजा भीमसेन दोबारा दमयंती के विवाह की तैयारी करते हैं। जब इसकी सूचना नल को मिलती है तो वह राजा भीमसेन के पास जाकर कहता है कि मैं अपना राज्य वापस पाने की तैयारी कर रहा था और अब मैं अपनी पत्नी तथा बच्चों को ले जा रहा हूं। राजकुमार नल राजा रितुपर्ण के साथ मिलकर पुष्कर से युद्ध करता है और अपना राज्य वापस पा लेता है।


इस तरह राजा नल और दमयंती का दोबारा मिलन होता है। सांग में धर्मबीर, सोनू, कृष्ण कुमार, सरजू, सुभाष, नफेसिंह, प्रवीण, इंद्र, नरेन, राजेश, पप्पी, कृष्ण, मोनू तथा महावीर ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। मुख्य अतिथि एसएस बूरा ने सांगी धर्मबीर को मैक की और से स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। मैक उपनिदेशक विश्व दीपक त्रिखा ने मुख्यातिथि प्रोफेसर एसएस बूरा तथा एनसीजेडसीसी के कार्यक्रम अधिकारी राजेंद्र को स्मृति चिह्न देकर उनका आभार व्यक्त किया।
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