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मास्टर की एक पिछाण, कदै ना फूहड़ गावै

Tue, 19 Jul 2016 12:19 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सोनीपत
ब्यूरो/अमर उजाला, सोनीपत Updated Tue, 19 Jul 2016 12:19 AM IST
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रागिनी कैसेट कंपनी के मालिक के भाई की शादी में 1990 में नरेला कार्यक्रम पेश करते मास्टर सतवीर। - फोटो : bureau
चार दशक तक हरियाणा लोक कला में छाए रहे मास्टर सतवीर सिंह का अलग ही मुकाम रहा। मुंबई, मद्रास, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में अपनी रागिनियों से लोगों के मन को मोहा। उन्होंने सामाजिक किस्सों के अलावा कभी भी समाज में अभाव की रागिनियों को तवज्जो नहीं दी। पंडित लख्मी चंद, धनपत, मेहर सिंह और मांगेराम की हजारों रागिनियां गाईं। 2012 में जींद जिले के पड़ाना गांव में आखिरी कंपीटीशन में भाग लिया। नल-दयमंती और शाही लक्कड़हारा उनका पसंदीदा किस्सा रहा।   
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हरियाणवी लोक कला में फूहड़पन से थे बेहद आहत
रविवार को अमर उजाला की ओर से मास्टर सतवीर सिंह के गांव भैंसवाल कलां में निशुल्क मेडिकल चेकअप कैंप लगाया गया। अमर उजाला की टीम को पता चला कि हरियाणा के प्रसिद्ध लोकगायक और कुश्ती खिलाड़ी योगेश्वर दत्त के गुरु मास्टर सतवीर बीमार हैं तो कैंप के बाद अमर उजाला की टीम उनका हालचाल पूछने घर पहुंची। उस समय मास्टर सतवीर न केवल आराम से बातचीत कर रहे थे, बल्कि सवालों का जवाब भी दे रहे थे। मास्टर सतवीर ने कहा कि अमर उजाला यूं गांव-गांव जाकर फ्री मेडिकल कैंप लगाकर अपना सामाजिक दायित्व निभा रहा है। बातचीत में उन्होंने बताया कि आजकल हरियाणा लोक गानों और रागिनियों में फूहड़पन काफी आ गया है। इससे समाज पर गलत प्रभाव पड़ता है। खासकर युवा वर्ग नकारात्मक तौर पर प्रभावित होता है। प्रदेश सरकार को इस फूहड़पन को रोकने के लिए कोई न कोई कदम उठाना चाहिए।
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इनाम और तस्वीरों से सजा है मास्टर का कमरा
31 साल तक अनेक लेखकों की रागिनियों से लोगों का मन मोहने वाले हरियाणवी कलाकार का कमरा इनामों और उनकी तस्वीरों से भरा है। जहां 2005 में इदियाना, 2005 में रभड़ा और 2016 में उनके धारूहेड़ा निवासी रामविलास द्वारा हाथ से बनाई गई तस्वीर समेत अनेक तस्वीरें और इनाम सजे हैं। इसके अलावा उनकी ही एक कविता भी लिखी हुई है।
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...जब भिवानी के साथी शिक्षक ने कविता से यूं किया मास्टर की महिमा का बखान
30 अप्रैल 2009 को मास्टर सतवीर के सेवानिवृत्ति में भिवानी स्थित लालबहादुर शास्त्री उच्च विद्यालय के प्रबंधक और साथी शिक्षक सत्यनारायण कौशिक ने एक कविता भेंट की।
सरकारी नौकरी करते-करते पौध करी कई तैयार तनै,
शत-शत नमन हमारा, पंडित लख्मीचंद के अवतार तनै।
पंडित जुगलाल जी का पोता है, दुनिया में नाम कमाया,
पंडित पिरथी सिंह का बेटा सै, सतवीर नाम धराया।
9 मार्च, सन् 83 मैं हम सब, खुश हुए नौकरी पाकै,
करी शुरुआत सबतै पहलां, जौली गाम में जाकै।
रबड़ा गाम मै कई साल बिताए, काम करा मन लाकै,
रिवाड़ा गाम तै रिटायर हुए, सब विदा करै मन लाकै।
सतवीर मास्टर की एक पिछाण, कदे ना फूहड़ गावै,
शुद्ध उच्चारण करै बात का, तोड़-तोड़ समझावै।

लोकगायकी के हमसफर बोले
कदै भूंडा ना गाया मास्टर न, पंडित मांगेराम और पंडित लख्मीचंद का एक-एक किस्सा रहता था याद। मास्टर सतवीर शर्मा 40 साल हरियाणा की लोक गायकी के क्षेत्र में छाए रहे। समकालीन प्रसिद्ध रागिनी गायक रणवीर बड़वासनिया, पालेराम हलालपुरिया, सत्ते फरमाणिया और बाद के कलाकार नरेंद्र दांगी, सुमित सतरोड़, विकास पासौर, सूरजमल छतहेरा और जितेंद्र पड़ाना मास्टर सतवीर की गायकी के कायल हैं।

राजकिशन के बाद मास्टर आए और छाए
राजकिशन अगवानपुरिया रागिनी के काफी अच्छे गायक रहे। उनके बाद मास्टर सतवीर सिंह आए और छा गए। मास्टर जी की याददाश्त बड़ी तेज थी। 12 साल तक उन्होंने भी मास्टर सतवीर सिंह के साथ गाया है। उनके देहांत से हरियाणा के लोक कला जगत में कभी न भरने वाले क्षति हुई है।  
-सत्ते फरमाणिया, रागणी गायक

रागनी से तुरंत जवाब देते थे मास्टर सतबीर
सोमवार सुबह मास्टर सतवीर सिंह के देहांत की खबर सुनते ही गहरा आघात लगा। वे तुरंत साथी कलाकारों के साथ गांव में पहुंचे। मास्टर सतवीर सिंह के साथ 30 से 32 साल रागनी कंपीटीशन में भाग लिया। उनकी खासियत यह रही कि उन्हें पंडित लख्मीचंद और पंडित मांगेराम का एक-एक किस्सा याद रहता था। ऊपरा-तली की रागिनियों में तुरंत रागनी से जवाब दे देते थे।

-रणवीर बड़वासनिया, रागिनी गायक

कदै भूंडा ना गाया मास्टर न
मास्टर सतवीर सिंह के साथ 40 साल तक गायकी की है। 1975 में मैने पार्टी बना ली थी। मास्टर सतवीर सिंह और मेरी खास पहचान यह थी कि दोनों ने कदै भूंडा ना गाया। कोई सुने या न सुने। पंडित लख्मी चंद और पंडित मांगेराम की कविताओं को रागिनियों के माध्यम से लोगों के सामने रखा। जिनमें कोई न कोई सीख होती थी।
-पालेराम हलालपुरिया
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