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किसान आंदोलन जितना लंबा हो रहा, रणनीति को लेकर उतने मतभेद होने लगे

Sun, 07 Feb 2021 11:59 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 07 Feb 2021 11:59 PM IST
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अंकित चौहान
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सोनीपत। किसान आंदोलन में भले ही संगठनों के नेता एक मंच पर दिखाई देते हो, लेकिन जिस तरह से आंदोलन लंबा हो रहा है। उस तरह ही आंदोलन की रणनीति को लेकर मतभेद भी होने लगे हैं। पहले ट्रैक्टर परेड के रूट को लेकर मतभेद हुआ और उन नेताओं को निलंबित तक करना पड़ा। वहीं अब राकेश टिकैत ने संयुक्त किसान मोर्चा से बातचीत किए बिना ही चक्का जाम नहीं करने के लिए खुद ही फैसला लिया तो कानून रद्द करने के लिए सरकार के सामने समय सीमा तक खुद ही तय कर दी। संयुक्त किसान मोर्चा ने भले ही टिकैत के यूपी व उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं करने के फैसले को बाद में मान लिया हो, लेकिन अब 2 अक्तूबर तक की समय सीमा तय करने के बयान से मोर्चा के नेताओं ने पल्ला झाड़ लिया है।
कृषि कानून रद्द कराने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को 74 दिन हो चुके हैं और किसान व सरकार जिस तरह से अड़े हुए है, उससे यह आंदोलन अभी लंबा चलता दिख रहा है। आंदोलन से जहां किसानों के करीब 40 संगठन जुड़े हैं और आंदोलन में किसी तरह का मतभेद नहीं हो, उसके लिए ही संयुक्त किसान मोर्चा बनाया गया था। अब आंदोलन लंबा होता जा रहा है तो संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े संगठनों के नेताओं में रणनीति को लेकर भी मतभेद दिखने शुरू हो गए हैं। इस मतभेद की शुरुआत ट्रैक्टर परेड से हुई। जहां संयुक्त किसान मोर्चा ने ट्रैक्टर परेड को दिल्ली में आउटर रिंग रोड से निकालने का फैसला लिया था, उसको दिल्ली पुलिस से बैठकों के बाद बदल दिया गया। उसके बावजूद दो संगठनों के नेता ट्रैक्टर परेड में तय रूट से नहीं गए और अब हालात यह हो गए है कि किसान मोर्चा को उन संगठनों के नेताओं को फिलहाल निलंबित करना पड़ा। उस ट्रैक्टर परेड के दौरान बवाल हुआ तो किसान आंदोलन भी टूटने लगा, लेकिन भाकियू के प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसुओं से आंदोलन को दोबारा संजीवनी मिली। जिसके बाद से लगातार राकेश टिकैत व संयुक्त किसान मोर्चा में आंदोलन की रणनीति को लेकर मतभेद दिखने लगा है।
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संयुक्त किसान मोर्चा के देशभर में चक्का जाम को एक दिन पहले ही टिकैत ने बदल दिया और मोर्चा से बातचीत किए बिना उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं करने का फैसला लिया। उसपर सवाल उठे तो संयुक्त किसान मोर्चा ने किसी तरह से उसे संभाला और यूपी व उत्तराखंड में चक्का जाम के दौरान हिंसा होने के डर से यह फैसला लिए जाने का तर्क दिया गया। अब दोबारा से राकेश टिकैत ने कानून रद्द करने के लिए सरकार के पास 2 अक्तूबर तक का समय होने की बात कही तो इस बार संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने पल्ला झाड़ लिया। किसान नेता कहते हैं कि यह आंदोलन अक्तूबर से आगे भी चल सकता है, क्योंकि जिस तरह से सरकार का रुख दिख रहा है। उससे नहीं लगता कि सरकार जल्द ही कुछ करने वाली है। हालांकि जिस तरह से संगठनों के नेता अब संयुक्त किसान मोर्चा से बातचीत किए बिना ही रणनीति को लेकर अपने फैसले ले रहे है, उससे यह जरूर साफ हो रहा है कि किसान नेता आंदोलन की रणनीति को लेकर एक राय नहीं है।
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मंच की तरह रणनीति भी एक रखना चुनौती
जिस तरह से किसान नेता अभी तक एक ही मंच पर दिख रहे हैं, उस तरह ही आंदोलन की रणनीति भी एक ही रखनी होगी। किसान नेता कहते हैं कि आंदोलन का मकसद किसानों को उनका हक दिलाना है और जब किसी आंदोलन में कई संगठन होते हैं तो उसमें सभी के एकजुट होकर रणनीति बनाने से आंदोलन के लिए ज्यादा बेहतर होता है। हालांकि जिस तरह से पिछले दस दिन में रणनीति को लेकर एक राय नहीं होती दिख रही है, उसको आगे एक रखना संयुक्त मोर्चा के लिए चुनौती जरूर होगा। किसान नेता दावा करते हैं कि सभी संयुक्त मोर्चा से जुड़े हैं और कई बार आंदोलन की बेहतरी के लिए जल्दबाजी में कुछ फैसले लिए जाते है।

वर्जन
संयुक्त किसान मोर्चा के किसी भी संगठन में रणनीति या अन्य किसी बात को लेकर मतभेद नहीं है। सभी किसानों की हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और ऐसा होता है कि कई बार आंदोलन में जल्दबाजी में कुछ फैसले लेने पड़ते हैं। यह जरूर है कि वह फैसले भी सभी से बातचीत करके लिए जाए तो ज्यादा अच्छा होता है। जहां तक राकेश टिकैत के 2 अक्तूबर तक के समय की बात है तो ऐसा नहीं है और यह आंदोलन लंबा भी चल सकता है।
- दर्शनपाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा
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