किसान आंदोलन का एक माह : पंजाब से दिल्ली और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक गूंजा 'अन्नदाता' का रोष
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दिल्ली सीमा पर कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुए किसान आंदोलन को पूरा एक महीना हो चुका है। पंजाब से शुरू हुआ यह आंदोलन देश के कई राज्यों में फैलने के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। सड़कों पर किसान बढ़ते गए तो आंदोलन में शामिल किसानों की जान भी जाती रही और इसकी गूंज विदेशों तक पहुंच गई।
एक महीने में किसान संगठनों के नेताओं की 22 बार बैठक हुई और उनमें नेशनल हाईवे जाम से लेकर अनशन तक की रणनीति बनाई गई। इस बीच सरकार ने छह बार प्रस्ताव भी दिए, जिनमें से तीन पर बातचीत के लिए किसान गए। उसके बावजूद गतिरोध कम होने की जगह बढ़ता जा रहा है और किसान केवल एक मांग पर अड़े हुए हैं कि कृषि कानून रद्द किए जाएं।
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एक महीना पूरा कर चुका किसान आंदोलन कब तक चलेगा, यह कोई नहीं जानता है। पंजाब के किसानों ने कृषि कानून रद्द करने की मांग को लेकर एक महीने पहले दिल्ली के लिए कूच किया था। बैरियर व पत्थर हटाते हुए आधी रात को हरियाणा में पहुंचने शुरू हो गए थे। सिंघु बॉर्डर पर दिल्ली पुलिस के साथ किसानों की झड़प हुई तो नेशनल हाईवे 44 पर पड़ाव डाल दिया गया और उसी दिन से किसान वहां डटे हुए हैं।
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उस समय पंजाब के करीब 25 हजार किसान ही यहां थे, लेकिन उसके बाद हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, ओडिशा, केरल समेत अन्य राज्यों के किसान भी पहुंचने शुरू हो गए। आंदोलन लंबा चलता देखकर पंजाब के किसान के कई जत्थे बाद में बॉर्डर पर पहुंचे और किसानों की संख्या बढ़कर 50 हजार से अधिक हो गई। उस समय तापमान ठीक था, बाद में ठंड बढ़ने लगी। ठंड में हार्टअटैक होने से किसानों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया।
किसी की दुर्घटना में जान गई तो संत रामसिंह ने आत्महत्या कर ली। इस तरह 22 से ज्यादा किसानों की जान भी चली गई। जिसकी गूंज देश के साथ ही विदेशों तक गई और किसानों का आंदोलन अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया। हालांकि किसानों का हौसला कम नहीं हुआ। किसान आंदोलन के समर्थन में एनआरआई व विदेशी सांसद तक आ गए है और इतना कुछ होने के बावजूद एक महीने बाद भी कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा है।
बैठकें होती रहीं, रणनीतियां बनती रहीं
एक महीने के आंदोलन के दौरान किसान संगठनों के नेताओं की 22 बार बैठक हुई, जिसमें देशभर के किसान संगठनों के नेता शामिल किए गए। इनमें नेशनल हाईवे जाम करके दिल्ली की घेराबंदी, टोल प्लाजा फ्री, जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन, अनशन तक की रणनीति बनाई गई। वहीं किसानों ने गुस्से में एक्सप्रेस वे तक रोक दिया। किसानों का आंदोलन इतना कुछ करने के बाद भी थमता नहीं दिख रहा है, बल्कि वह लगातार आंदोलन को चलाए रखने की रणनीति तय कर रहे है और सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है।सरकार ने 6 प्रस्ताव भेजे, 3 बार बातचीत, गतिरोध बढ़ा
किसानों के आंदोलन को देखते हुए सरकार ने एक महीने में छह बार बातचीत का प्रस्ताव भेजा। किसानों ने शुरुआत में तीन बार बातचीत की, जिससे कानूनों को लेकर कोई फैसला हो सके और किसान आराम से अपने घर चले जाएं। कृषि मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक से बातचीत हुई। हर बार बातचीत अगले दौर के लिए टलती रही। जिसके बाद किसान नेताओं ने ठोस प्रस्ताव आने के बाद ही बातचीत करने का फैसला लिया।
अब तीन बार सरकार प्रस्ताव भेज चुकी है, लेकिन दो बार किसान उनको नकार चुके है तो तीसरे का अभी जवाब दिया जाना है। हालांकि उसके एजेंडे को देखते हुए भी किसान उसे लगभग नकार चुके हैं, लेकिन उसके बावजूद बैठक में आधिकारिक फैसला लेने की बात कही जा रही है। किसानों ने साफ कर दिया है कि वह केवल कृषि कानून रद्द करने के एजेंडे पर बातचीत करेंगे और कानून रद्द कराकर ही वापस जाएंगे। इस तरह से आंदोलन खत्म होने की जगह गतिरोध बढ़ता जा रहा है।
किसान आंदोलन को एक महीना बीत चुका है और किसानों ने साफ कर दिया है कि कृषि कानून रद्द कराने से कम कुछ मंजूर नहीं है। सरकार लगातार प्रस्ताव भेजकर बरगला रही है, जबकि सही मुद्दे पर बात ही नहीं कर रही है। सरकार को आंदोलन खत्म कराना है तो उसे ठोस प्रस्ताव भेजकर बातचीत करनी होगी। हमारी ओर से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला हुआ है। आंदोलन चाहे एक महीने की जगह एक साल चलाना पड़ा, लेकिन हमारी मांग कृषि कानून रद्द करने की रहेगी। - दर्शनपाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा