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गुरु बिन ज्ञान नहीं, ज्ञान बिन मुक्ति नहीं : स्वामी दिनेशानंद
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सिरसा। अनाज मंडी स्थित श्री श्याम बगीची धाम में कथा का वाचन करते हुए स्वामी दिनेशानंद महाराज। स
सिरसा। अनाज मंडी स्थित श्री श्याम बगीची धाम में श्री मद्भागवत कथा वीरवार को आयोजन किया जा रहा है। कथा 7वें दिन स्वामी दिनेशानंद महाराज ने कहा कि गुरु बिन ज्ञान नहीं, ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं। चाहे ब्रह्मा, शंकर के समान महान हो, किंतु गुरु बिना भवसागर से पार नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए। वस्तुस्थिति यह है कि उन्होंने पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु, आकाश, अजगर, भृंगी आदि पदार्थों से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने पृथ्वी से सहनशीलता, जल से मधुरता इसी तरह उन्होंने अन्य प्राकृतिक पदार्थों से गुण ग्रहण किए। उन्होंने कहा कि भागवत कथा के अंत में शुकदेव महाराज ने अपने शिष्य को पास में बैठाया और ब्रह्म ज्ञान दिया।
शुकदेव गुरु ने कहा हे राजन मैं मरुंगा, यह पशु बुद्धि छोड़ दे। मैं शरीर हूं इस गलत धारणा को छोड़ दो। तू शरीर नहीं है। शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, विकसित होता है बूढ़ा होता है और अंत में मर जाता है। किंतु तू शरीर नहीं है, इंद्रियां, मन, बुद्धि नहीं हो। उन्होंने कहा कि शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है और मरता है। लेकिन आत्मा जब जन्म ही नहीं लेती तो मरेगी कैसे।
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उन्होंने कहा कि आत्मा को शस्त्र काट नही सकता, पानी इसे गला नही सकता और वायु इसे सूखा नहीं सकती। आत्मा तो अजर अमर है। स्वामी दिनेशानंद ने कहा कि मनुष्य को जीवन मरन के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा में ध्यान लगाना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए। वस्तुस्थिति यह है कि उन्होंने पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु, आकाश, अजगर, भृंगी आदि पदार्थों से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने पृथ्वी से सहनशीलता, जल से मधुरता इसी तरह उन्होंने अन्य प्राकृतिक पदार्थों से गुण ग्रहण किए। उन्होंने कहा कि भागवत कथा के अंत में शुकदेव महाराज ने अपने शिष्य को पास में बैठाया और ब्रह्म ज्ञान दिया।
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शुकदेव गुरु ने कहा हे राजन मैं मरुंगा, यह पशु बुद्धि छोड़ दे। मैं शरीर हूं इस गलत धारणा को छोड़ दो। तू शरीर नहीं है। शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, विकसित होता है बूढ़ा होता है और अंत में मर जाता है। किंतु तू शरीर नहीं है, इंद्रियां, मन, बुद्धि नहीं हो। उन्होंने कहा कि शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है और मरता है। लेकिन आत्मा जब जन्म ही नहीं लेती तो मरेगी कैसे।
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उन्होंने कहा कि आत्मा को शस्त्र काट नही सकता, पानी इसे गला नही सकता और वायु इसे सूखा नहीं सकती। आत्मा तो अजर अमर है। स्वामी दिनेशानंद ने कहा कि मनुष्य को जीवन मरन के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा में ध्यान लगाना चाहिए।