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Sirsa News: मुख्य धाम बाबा भूमणशाह में मनाया पर्व
Thu, 15 Jan 2026 12:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Thu, 15 Jan 2026 12:10 AM IST
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सिरसा।सिरसा। मुख्य धाम बाबा भूमणशाह में लोहड़ी का पर्व मनाते हुए गद्दीनशीन संत बाबा ब्रह्मदास
संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। मुख्य धाम बाबा भूमणशाह, ग्राम बाबा भूमणशाह में गद्दीनशीन संत बाबा ब्रह्मदास महाराज के सानिध्य में मंगलवार को हर्षोल्लास के साथ लोहड़ी पर्व मनाया गया। बाबा ब्रह्मदास महाराज ने श्रद्धालुओं को लोहड़ी के पावन पर्व व मकर संक्रांति की शुभकामनाएं दीं।
बाबा ब्रह्मदास ने कहा कि लोहड़ी केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना है। लोहड़ी के गीत मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक-न्याय की आवाज हैं। इनमें दुल्ला-भट्टी जैसे लोकनायक हैं, जो बेटियों की इज्जत के लिए खड़े होते हैं। किसान हैं, जिनकी मेहनत को उत्सव का आधार बनाया गया और आग है, जो बराबरी और साझेदारी का प्रतीक बन जाती है। यही कारण है कि लोहड़ी के गीतों में सामाजिक बुराइयों पर सीधा प्रहार मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लोहड़ी को दुल्ला भट्टी वाला की कहानी से जोड़ा जाता है।
लोहड़ी के गाने दुल्ला भट्टी से जुड़े हैं। दुल्ला भट्टी मुगलों के समय में एक बहादुर योद्धा थे। उन्होंने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया था। उस समय संदल बार की जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेचा जाता था। उनमें सुंदरी और मुंदरी नामक दो बहनें भी थीं। दोनों लड़कियों की सगाई कहीं और तय हुई थी और मुगल शासक के डर से उनके भावी ससुराल वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ लड़कियों को मुक्त करवाया, बल्कि मुसीबत की इस घड़ी में लडक़े वालों को मनाकर एक जंगल में आग जलाकर दोनों की शादी भी करवाई। खुद ही उन दोनों का कन्यादान भी किया।
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सिरसा। मुख्य धाम बाबा भूमणशाह, ग्राम बाबा भूमणशाह में गद्दीनशीन संत बाबा ब्रह्मदास महाराज के सानिध्य में मंगलवार को हर्षोल्लास के साथ लोहड़ी पर्व मनाया गया। बाबा ब्रह्मदास महाराज ने श्रद्धालुओं को लोहड़ी के पावन पर्व व मकर संक्रांति की शुभकामनाएं दीं।
बाबा ब्रह्मदास ने कहा कि लोहड़ी केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना है। लोहड़ी के गीत मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक-न्याय की आवाज हैं। इनमें दुल्ला-भट्टी जैसे लोकनायक हैं, जो बेटियों की इज्जत के लिए खड़े होते हैं। किसान हैं, जिनकी मेहनत को उत्सव का आधार बनाया गया और आग है, जो बराबरी और साझेदारी का प्रतीक बन जाती है। यही कारण है कि लोहड़ी के गीतों में सामाजिक बुराइयों पर सीधा प्रहार मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लोहड़ी को दुल्ला भट्टी वाला की कहानी से जोड़ा जाता है।
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लोहड़ी के गाने दुल्ला भट्टी से जुड़े हैं। दुल्ला भट्टी मुगलों के समय में एक बहादुर योद्धा थे। उन्होंने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया था। उस समय संदल बार की जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेचा जाता था। उनमें सुंदरी और मुंदरी नामक दो बहनें भी थीं। दोनों लड़कियों की सगाई कहीं और तय हुई थी और मुगल शासक के डर से उनके भावी ससुराल वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ लड़कियों को मुक्त करवाया, बल्कि मुसीबत की इस घड़ी में लडक़े वालों को मनाकर एक जंगल में आग जलाकर दोनों की शादी भी करवाई। खुद ही उन दोनों का कन्यादान भी किया।
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