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Sirsa News: गुलाबी सुंडी से निपटने और कपास की पैदावार बढ़ाने पर जोर
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सिरसा। सम्मेलन समाप्त होने के बाद पौध रोपण करते हुए डॉ. यादव। संस्थान
सिरसा। कपास की पैदावार बढ़ाने और गुलाबी सुंडी सहित कीट-रोगों से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिक खेती, उन्नत किस्मों और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना जरूरी है। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (सीआईसीआर) के क्षेत्रीय केंद्र में रविवार को आयोजित छठे राष्ट्रीय सम्मेलन में हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में कपास उत्पादन की चुनौतियों और समाधान पर चर्चा हुई।
वैज्ञानिकों ने फसल की नियमित निगरानी, जलवायु-अनुकूल खेती, बेहतर सिंचाई और किसानों को समय पर प्रशिक्षण देने पर जोर दिया।भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने गुलाबी सुंडी की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक सलाह और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन को जरूरी बताया।
उन्होंने कहा कि केवल कीटनाशकों के छिड़काव पर निर्भर रहने के बजाय समग्र फसल प्रबंधन अपनाना होगा। उन्होंने फसल निगरानी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), कृषि मूल्य शृंखला के विकास और खेतों में नई तकनीकों के प्रदर्शन पर भी जोर दिया। नकली खाद और बीज की रोकथाम के साथ गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
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चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति डॉ. बीआर कंबोज ने कृषि प्रसार अधिकारियों के माध्यम से वैज्ञानिक तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने और भविष्य के कीट-रोगों से निपटने के लिए अनुसंधान मजबूत करने की बात कही। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप-महानिदेशक (कृषि प्रसार) डॉ. राजबीर सिंह ने समय पर मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण बताया।
सीआईसीआर के निदेशक डॉ. वीएन वाघमारे ने उत्तर भारत में कपास का रकबा और प्रति एकड़ उत्पादकता बढ़ाने पर चर्चा की। सिरसा केंद्र के अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसके वर्मा ने क्षेत्र में फसल की स्थिति और समस्याओं की जानकारी दी। प्रधान वैज्ञानिक डॉ. ऋषि कुमार ने कीट-रोग नियंत्रण और जलवायु-अनुकूल तकनीकों पर विचार रखे। सम्मेलन में अधिक उपज और बेहतर प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्मों, सूक्ष्म सिंचाई, सघन खेती और मशीनीकरण को बढ़ावा देने पर सहमति जताई गई।
14 राज्यों के 140 जिलों में तकनीकों का प्रदर्शन
कपास उत्पादकता मिशन के तहत 14 राज्यों के 140 जिलों में 23.71 लाख प्रदर्शन और 28 हजार किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की जानकारी दी गई। डॉ. डीके यादव ने बताया कि केंद्र सरकार ने कपास उत्पादकता बढ़ाने के लिए 5,500 करोड़ रुपये की लागत वाला नेशनल मिशन ऑन कॉटन प्रोडक्टिविटी शुरू किया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2002 में बीटी कॉटन की शुरुआत के बाद लिंट उत्पादकता करीब 290-300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2016-17 में 540-550 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई थी। अब उत्पादकता में और वृद्धि के लिए उन्नत किस्मों, बेहतर सिंचाई और प्रभावी कीट-रोग प्रबंधन को बढ़ावा देना जरूरी है।
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वैज्ञानिकों ने फसल की नियमित निगरानी, जलवायु-अनुकूल खेती, बेहतर सिंचाई और किसानों को समय पर प्रशिक्षण देने पर जोर दिया।भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने गुलाबी सुंडी की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक सलाह और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन को जरूरी बताया।
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उन्होंने कहा कि केवल कीटनाशकों के छिड़काव पर निर्भर रहने के बजाय समग्र फसल प्रबंधन अपनाना होगा। उन्होंने फसल निगरानी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), कृषि मूल्य शृंखला के विकास और खेतों में नई तकनीकों के प्रदर्शन पर भी जोर दिया। नकली खाद और बीज की रोकथाम के साथ गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
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चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति डॉ. बीआर कंबोज ने कृषि प्रसार अधिकारियों के माध्यम से वैज्ञानिक तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने और भविष्य के कीट-रोगों से निपटने के लिए अनुसंधान मजबूत करने की बात कही। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप-महानिदेशक (कृषि प्रसार) डॉ. राजबीर सिंह ने समय पर मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण बताया।
सीआईसीआर के निदेशक डॉ. वीएन वाघमारे ने उत्तर भारत में कपास का रकबा और प्रति एकड़ उत्पादकता बढ़ाने पर चर्चा की। सिरसा केंद्र के अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसके वर्मा ने क्षेत्र में फसल की स्थिति और समस्याओं की जानकारी दी। प्रधान वैज्ञानिक डॉ. ऋषि कुमार ने कीट-रोग नियंत्रण और जलवायु-अनुकूल तकनीकों पर विचार रखे। सम्मेलन में अधिक उपज और बेहतर प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्मों, सूक्ष्म सिंचाई, सघन खेती और मशीनीकरण को बढ़ावा देने पर सहमति जताई गई।
14 राज्यों के 140 जिलों में तकनीकों का प्रदर्शन
कपास उत्पादकता मिशन के तहत 14 राज्यों के 140 जिलों में 23.71 लाख प्रदर्शन और 28 हजार किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की जानकारी दी गई। डॉ. डीके यादव ने बताया कि केंद्र सरकार ने कपास उत्पादकता बढ़ाने के लिए 5,500 करोड़ रुपये की लागत वाला नेशनल मिशन ऑन कॉटन प्रोडक्टिविटी शुरू किया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2002 में बीटी कॉटन की शुरुआत के बाद लिंट उत्पादकता करीब 290-300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2016-17 में 540-550 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई थी। अब उत्पादकता में और वृद्धि के लिए उन्नत किस्मों, बेहतर सिंचाई और प्रभावी कीट-रोग प्रबंधन को बढ़ावा देना जरूरी है।