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Rohtak News: सुनीता ने शौक को बनाया कमाई का जरिया
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सबहेड-थैले सिलते-सिलते आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं सुनीता, ताने झेले पर रुकी नहीं
सुनीता का दिन सुबह पांच बजे शुरू होता और रात ग्यारह बजे खत्म। लेकिन उन्हें उस काम के बदले वेतन नहीं मिलता है। उनके पास एक हुनर था। पुरानी साड़ियों और कपड़ों के टुकड़ों से वह सुंदर थैले, पर्स और सजावटी सामान बना लेती थीं। उनकी पड़ोस की महिला मित्र ने कहा कि सुनीता ये तो बाजार में बिकने लायक हैं। पर घर में सब हंसकर टाल देते थे। अरे, ये तो इसका शौक है।
एक दिन सुनीता ने ठान लिया कि शौक को काम बनाएंगी। उन्होंने अपनी बचत से कपड़ा खरीदा और दस थैले बनाए। पड़ोस की दो महिलाओं को साथ जोड़ा। बेटे की मदद से तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर डालीं। पहला ऑर्डर आया तो उसके हाथ कांप गए।
शुरू में ताने मिले। औरत का काम घर संभालना है। कमाई भी बस इतनी थी कि कपड़े का खर्च निकल जाए। पर सुनीता रुकी नहीं। धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़ने लगे और साल भर में उसके साथ आठ महिलाएं काम करने लगीं।
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अब सुनीता अपने फैसले खुद लेती थीं। घर के खर्च में बराबर हिस्सा देती थीं। जिस पति ने कभी उसके काम को शौक कहा था वही अब मोहल्ले में कहते हैं मेरी पत्नी का काम है।
एक शाम पति ने गुस्से में उस पर हाथ उठाने की कोशिश की। सुनीता ने उसकी आंखों में देखकर शांत स्वर में कहा, अब नहीं। मैं अपने सम्मान के लिए बोलना जानती हूं। आज उनकी बेटी मां के काम में हाथ बंटाती हैं और कहती हैं मैं भी आपकी तरह अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी।
नाम-दृष्टि
पिता का नाम-विजय कुमार
कक्षा-नौवीं
स्कूल-एचडी स्कूल, साल्हावास
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सुनीता का दिन सुबह पांच बजे शुरू होता और रात ग्यारह बजे खत्म। लेकिन उन्हें उस काम के बदले वेतन नहीं मिलता है। उनके पास एक हुनर था। पुरानी साड़ियों और कपड़ों के टुकड़ों से वह सुंदर थैले, पर्स और सजावटी सामान बना लेती थीं। उनकी पड़ोस की महिला मित्र ने कहा कि सुनीता ये तो बाजार में बिकने लायक हैं। पर घर में सब हंसकर टाल देते थे। अरे, ये तो इसका शौक है।
एक दिन सुनीता ने ठान लिया कि शौक को काम बनाएंगी। उन्होंने अपनी बचत से कपड़ा खरीदा और दस थैले बनाए। पड़ोस की दो महिलाओं को साथ जोड़ा। बेटे की मदद से तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर डालीं। पहला ऑर्डर आया तो उसके हाथ कांप गए।
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शुरू में ताने मिले। औरत का काम घर संभालना है। कमाई भी बस इतनी थी कि कपड़े का खर्च निकल जाए। पर सुनीता रुकी नहीं। धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़ने लगे और साल भर में उसके साथ आठ महिलाएं काम करने लगीं।
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अब सुनीता अपने फैसले खुद लेती थीं। घर के खर्च में बराबर हिस्सा देती थीं। जिस पति ने कभी उसके काम को शौक कहा था वही अब मोहल्ले में कहते हैं मेरी पत्नी का काम है।
एक शाम पति ने गुस्से में उस पर हाथ उठाने की कोशिश की। सुनीता ने उसकी आंखों में देखकर शांत स्वर में कहा, अब नहीं। मैं अपने सम्मान के लिए बोलना जानती हूं। आज उनकी बेटी मां के काम में हाथ बंटाती हैं और कहती हैं मैं भी आपकी तरह अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी।
नाम-दृष्टि
पिता का नाम-विजय कुमार
कक्षा-नौवीं
स्कूल-एचडी स्कूल, साल्हावास