मुझे पापा की सूरत याद आती है, वो न रहे मगर यादों का सितम दे गए। बदल गई तासीर अब तासीरी जिंदगी की, तुम क्या गए आंखों में इंतजार दे गए...। ये लाइनें 49 दिन पहले पिता को खोने वाली दो वर्ष सात माह की रिदिमा पर चरितार्थ हो रही है। वह कभी पिता की पीठ पर बैठ खिलखिलाती थी, तो कभी कंधे पर। अब वह हर समय पिता को तलाशती रहती है। दरवाजे पर आहट होते ही पिता के आने की आस में दौड़ती है, जब पिता नहीं दिखते तो रोती है।
बेगूसराय बिहार निवासी 26 वर्षीय राघव कुमार अपनी पत्नी प्रतीक्षा व दो साल सात माह की बेटी रिदिमा के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहे थे। एक कंपनी में कार्यरत राघव कुमार ने एकता कॉलोनी में छोटा सा आशियाना भी बना रखा था। सब कुछ अच्छा चल रहा था। 29 अप्रैल की देर शाम अचानक सांस लेने में उन्हें दिक्कत हुई तो पत्नी प्रतीक्षा तुरंत पीजीआई ले गई। डॉक्टरों ने तबीयत ज्यादा खराब बताते हुए उपचार शुरू कर दिया, मगर ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगा। तमाम प्रयासों के बावजूद 30 अप्रैल की तड़के उनकी मौत हो गई। प्रतीक्षा बताती हैं कि 49 दिन गुजर गए, मगर बेटी का पिता के आने का इंतजार खत्म नहीं हो रहा। पिता के जाने के बाद से वह काफी उदास रहने लगी है। दिनभर तुतलाते हुए पापा....पापा की रट लगाए रहती है। शुरुआत में बेटी ने खाना-पीना बंद कर दिया। जब लगा कि उसकी तबीयत खराब हो सकती है, तो उसे बाहर घुमाने के लिए भेजा, मगर उसका रोना बंद नहीं हुआ। बेटी की स्थिति देख आंखों में आंसू आ जाते हैं मगर रो नहीं सकती। किसी तरह से बेटी को शांत करना पड़ता है। उन्होंने 16 अप्रैल की मोबाइल फोन से ली पिता और बेटी की मस्ती करने की फोटो अंतिम फोटो है। इसमें कपड़े के घोड़े पर बेटी को बैठाकर वह मस्ती करते दिख रहे हैं। वह बताती हैं कि अब पति की यादों के सहारे मुझे और बेटी को जिंदगी की जंग लड़ते हुए आगे बढ़ना है।