सफल नहीं हुई ऑनलाइन पढ़ाई, मिड टर्म परीक्षा में 35 फीसदी बच्चे फेल
कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई ने विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता घटा दी है। हाल ही में चंडीगढ़ शिक्षा विभाग की ओर से आयोजित मिड टर्म परीक्षा में 35 फीसदी से ज्यादा विद्यार्थी फेल हो गए हैं। बमुश्किल से ओवरऑल परफार्मेंस 65 फीसदी तक पहुंची है जबकि कोरोना काल से पहले इस परीक्षा का परिणाम 85 से 90 फीसदी रहता था।
मिड टर्म परीक्षा दिसंबर के आखिरी सप्ताह में आयोजित हुई थी। इनमें से तीसरी से 12वीं तक के कक्षा के विद्यार्थी बैठे थे। बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों को स्कूल या घर से ही पेपर देने का विकल्प था जबकि छोटी कक्षा के लिए सिर्फ घर से ही ऑनलाइन पेपर देने का विकल्प था।
जब परिणाम आए तो उन विद्यार्थियों का परिणाम सबसे ज्यादा खराब रहा जिन्होंने कक्षा में आकर परीक्षा दी। इसके उलट जिन विद्यार्थियों ने घर पर बैठकर परीक्षा दी, वे काफी अच्छे नंबरों से पास हुए है। यह होना भी था। दरअसल इन विद्यार्थियों को प्रश्न पत्र पहले सौंप दिया गया था और उन्हें घर पर ही उसे हल कर स्कूल को सौंपना था। इन विद्यार्थियों के परिणाम 85 फीसदी तक रहे हैं। स्कूल प्रिंसिपलों का कहना है कि कई ऐसे बच्चे जो पढ़ाई में कमजोर थे, उनके भी अच्छे नंबर आए हैं। उनका मानना है कि घर पर प्रश्नपत्र हल करने के दौरान कोई सख्ती नहीं रही। कई विद्यार्थियों ने समूह में बैठकर प्रश्नपत्र हल किए।
जनवरी के पहले सप्ताह में विद्यार्थियों का परिणाम आया तो स्कूल प्रिंसिपल सहित शिक्षा विभाग के अधिकारियों के सामने चिंता खड़ी हो गई है कि विद्यार्थियों के प्रदर्शन में सुधार कैसे लाया जाए। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन परीक्षा को पढ़ाई का एक बेहतर विकल्प माना गया, लेकिन स्कूल स्तर के विद्यार्थियों के लिए यह कामयाब होता नहीं दिख रहा।
कई स्कूल प्रिंसिपल ने अमर उजाला से बातचीत में माना कि स्कूल से इतने दिन दूर रहने से विद्यार्थियों की पढ़ने व लिखने की आदत छूट गई है। स्कूल खुलने के बाद भी विद्यार्थी कक्षा में नहीं आ रहे हैं। अभिभावक भी विद्यार्थियों को स्कूल भेजने से कतरा रहे हैं। उन्हें इस बात को गंभीरता से समझना होगा कि विद्यार्थियों की पढ़ाई में जो गैप आया है, वो उनके बच्चों की आगे की पढ़ाई के लिए ठीक नहीं है।
मिड टर्म परीक्षा में यह दिखा असर
- लिखने व पढ़ने की आदत छूटी
- कई विद्यार्थी खाली कापी छोड़कर आ गए
- रचनात्मकता व आत्मविश्वास की कमी
- स्कूल आने की बजाय घर से पढ़ाई का मन
स्कूल खुलने के बाद गुणवत्ता में आएगा सुधार
यूटी के शिक्षा निदेशक रुबिंदरजीत सिंह बराड़ का कहना है कि ऑनलाइन शिक्षा एकतरफा है। इसमें टीचर व विद्यार्थियों के बीच संवाद नहीं हो पाता है। क्लासरूम में टीचर विद्यार्थियों के हाव-भाव देखकर समझ जाते थे कि उन्हें बातें समझ में आ रही है या नहीं। जिन विद्यार्थियों को समझ में नहीं आता था कि वे कई बार टीचरों से पूछते थे। इसके अलावा सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्मार्टफोन की उपलब्धता भी समस्याएं हैं। जब तक विद्यार्थी स्कूल नहीं आएंगे, तब तक उनके प्रदर्शन में सुधार नहीं हो सकता। एक फरवरी से छठी से बारहवीं तक के विद्यार्थियों के लिए स्कूल खोले जा रहे हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने विद्यार्थियों को स्कूल भेजे। तभी उनके प्रदर्शन पर सुधार हो पाएगा।सिर्फ अंक ही नहीं विद्यार्थियों का समग्र विकास भी प्रभावित
किसी विद्यार्थी के विकास में पाठ्यक्रम 30 फीसदी मायने रखता है। विद्यार्थी जब क्लास रूम में आते हैं तो वे टीचरों व सहपाठियों के हाव-भाव से, बोलने के तौर-तरीकों और आसपास के स्कूली वातावरण से बहुत कुछ सीखते हैं। सहपाठी विद्यार्थियों की अलग संस्कृति, धर्म, परिवार, उनकी रुचियों जैसे आर्ट एंड क्राफ्ट, पेंटिंग, खेल इत्यादि के अवलोकन से भी बच्चे की रचनात्मकता बढ़ती है और यह सब उसके समग्र विकास में सहायक होता है। ऑनलाइन में सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करवाने की होड़ लगी है, बच्चों को शिक्षित करने में नहीं। इतना समय घर रहने के बाद विद्यार्थियों के मन में भी यह चल रहा है कि अब ऑनलाइन ही पेपर देने है तो पढ़ने की जरूरत नहीं है, नकल से काम चल जाएगा। -प्रो जगदीश मेहता, विभागाध्यक्ष समाज शास्त्र, डीएवी कॉलेज - 10
छोटे तो सुधार कर लेंगे, बड़ी कक्षाओं के लिए थोड़ा मुश्किल
भारत में गुणवत्तापूर्ण ऑनलाइन शिक्षा मुहैया करवाना बहुत मुश्किल है। हमारे पास टेक्नोलॉजी नहीं है न ही हमारे शिक्षक टेक्नोलॉजी के साथ पढ़ाने में निपुण है। ऑनलाइन से स्कूली पढ़ाई की गुणवत्ता में गिरावट आई है। छोटे क्लास के विद्यार्थी को कुछ समय बाद पढ़ने की आदत फिर से विकसित हो जाएगी, लेकिन 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों को ज्यादा मेहनत करनी होगी। मेरा मानना है कि कॉलेज में दाखिले के दौरान इस बार थोड़ी नरमी भी बरतनी होगी, ताकि कमजोर विद्यार्थियों को दाखिला मिल सके, नहीं तो उनका कैरियर प्रभावित हो जाएगा। -प्रो धीरज सांघी, निदेशक, पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज