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चारों युगों में सुदामा-श्रीकृष्ण जैसी मित्रता किसी की नहीं : आचार्य संदीप
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संवाद न्यूज एजेंसी
पंचकूला। चारों युगों में भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता किसी की नहीं है। जिसके पास श्रीकृष्ण जैसा मित्र हो वह सुदामा बहुत भाग्यशाली है। यह बात सेक्टर-15 रघुनाथ मंदिर में श्री श्याम कथा के तीसरे दिन बनभौरी धाम के कथा व्यास आचार्य संदीप शास्त्री महाराज ने कहे। रघुनाथ मंदिर में श्री श्याम कथा के चौथे दिन भगवान खाटू नरेश का धूमधाम से जन्मदिवस मनाया गया। आचार्य संदीप ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा का प्रसंग सुनाया।
उन्होंने कहा कि जंगल में लकड़ी लेने गए सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने जान बूझकर खा लिए ताकि कृष्ण अपने गुरु संदीपनी महाराज के श्राप से बच सके। संदीपनी ऋषि एक बार तप करके लौटे तो वह भूख से व्याकुल थे। उन्होंने अपनी पत्नी सुमुखी से कुछ खिलाने का अनुग्रह किया। उनकी पत्नी ने बताया कि आश्रम में कुछ खाने के लिए नहीं है। इसके बाद संदीपनी ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो एक पोटली में चने बांधे रखे हुए थे।
उनकी पत्नी ने सुदामा और श्रीकृष्ण को देने के लिए रखे थे। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने श्राप दिया कि जो भी इन चनों को खाएगा वह दरिद्र हो जाएगा। यह श्राप सुदामा ने सुन लिया था। इस वजह से सुदामा ने कृष्ण के हिस्से भी स्वयं खा लिए। इसके चलते सुदामा बाद में दरिद्र हुए। अंत में श्रीकृष्ण से मिलने के बाद सुदामा की दरिद्रता नष्ट हो गई।
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पंचकूला। चारों युगों में भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता किसी की नहीं है। जिसके पास श्रीकृष्ण जैसा मित्र हो वह सुदामा बहुत भाग्यशाली है। यह बात सेक्टर-15 रघुनाथ मंदिर में श्री श्याम कथा के तीसरे दिन बनभौरी धाम के कथा व्यास आचार्य संदीप शास्त्री महाराज ने कहे। रघुनाथ मंदिर में श्री श्याम कथा के चौथे दिन भगवान खाटू नरेश का धूमधाम से जन्मदिवस मनाया गया। आचार्य संदीप ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा का प्रसंग सुनाया।
उन्होंने कहा कि जंगल में लकड़ी लेने गए सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने जान बूझकर खा लिए ताकि कृष्ण अपने गुरु संदीपनी महाराज के श्राप से बच सके। संदीपनी ऋषि एक बार तप करके लौटे तो वह भूख से व्याकुल थे। उन्होंने अपनी पत्नी सुमुखी से कुछ खिलाने का अनुग्रह किया। उनकी पत्नी ने बताया कि आश्रम में कुछ खाने के लिए नहीं है। इसके बाद संदीपनी ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो एक पोटली में चने बांधे रखे हुए थे।
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उनकी पत्नी ने सुदामा और श्रीकृष्ण को देने के लिए रखे थे। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने श्राप दिया कि जो भी इन चनों को खाएगा वह दरिद्र हो जाएगा। यह श्राप सुदामा ने सुन लिया था। इस वजह से सुदामा ने कृष्ण के हिस्से भी स्वयं खा लिए। इसके चलते सुदामा बाद में दरिद्र हुए। अंत में श्रीकृष्ण से मिलने के बाद सुदामा की दरिद्रता नष्ट हो गई।
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