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सुंदर चरित्र का निर्माण कर श्रेष्ठ समाज का सृजन संभव: भारती
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पंचकूला। श्री कृष्ण कथा का महात्मय बहुत ही महान है। जहां एक तरफ यह हमें शाश्वत शांति से अवगत करवाती है, वहीं दूसरी ओर जागरूक भी करती है। भगवान श्री कृष्ण का तत्व रूप में दर्शन अपने ही घट अर्थात शरीर के भीतर करने से एक इंसान वास्तविक जागृति को प्राप्त होता है। ईश्वरीय अनुभव के अभाव में व्यक्ति सद्गुणों को धारण नहीं कर सकता। भाव श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त कर सुंदर चरित्र का निर्माण कर ही श्रेष्ठ समाज का सृजन किया जा सकता है। उक्त शब्द दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक आशुतोष महाराज की शिष्या कथा व्यास साध्वी संयोगिता भारती ने कहे। वह रविवार को सेक्टर-10 स्थित श्री सनातन धर्म मंदिर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय श्री कृष्ण कथा के पहले दिन ज्ञान गंगा प्रवाहित कर रही थी।
कथा व्यास साध्वी संयोगिता भारती ने कहा कि वह परमात्मा संसार में अवतार लेकर आते हैं तो मात्र इस प्रयोजन से की मानव को उनके कर्म का ज्ञान करवा सके। इसका ज्ञान मात्र विवेक दृष्टि के खुल जाने पर ही प्राप्त होता है। दिव्य दृष्टि के माध्यम से ही ईश्वर का दीदार संभव है। वह प्रत्येेक मानव को उसके घट के भीतर ही अपने निराकार रूप का साक्षात्कार करवा देते हैं। हमारे संत महापुरुष कहते हैं कि श्री हरि जी सब जगह हैं, लेकिन नजर नहीं आते। इसका कारण यह है कि हम जिस तरह उसे खोजना चाहते हैं वह प्रभु इस तरह नहीं मिलता। जिस तरह पानी सर्वत्र है उसे हर जगह से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, उसे प्राप्त करने के लिए किसी नल, नदी आदि का होना जरूरी है। ऐसे ही वह ईश्वर भी सब जगह है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए जरूरत है अपने घट के भीतर में जाने वाले मार्ग को खोज कर उसे प्राप्त करने की।
हमारे धार्मिक ग्रंथ कहते है कि जैसे तिल में तेल, फूल में सुगंधी है, माखन में घी है ठीक ऐसे ही ईश्वर हमारे घट के भीतर है। वह किसी संत की कृपा से हमारे भीतर प्रगट होता है। इसलिए प्रभु प्राप्ती के लिए हमें पूर्ण गुरु की परम आवश्यकता है। प्रथम दिवस कथा को विराम प्रभु की पावन आरती द्वारा दिया गया। प्रभु की पावन आरती में श्री सनातन धर्म मंदिर सभा, महिला संकीर्तन मंडल एवं जागरण मंडल सेक्टर-10 पंचकूला के सभी सदस्य उपस्थित रहे।
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कथा व्यास साध्वी संयोगिता भारती ने कहा कि वह परमात्मा संसार में अवतार लेकर आते हैं तो मात्र इस प्रयोजन से की मानव को उनके कर्म का ज्ञान करवा सके। इसका ज्ञान मात्र विवेक दृष्टि के खुल जाने पर ही प्राप्त होता है। दिव्य दृष्टि के माध्यम से ही ईश्वर का दीदार संभव है। वह प्रत्येेक मानव को उसके घट के भीतर ही अपने निराकार रूप का साक्षात्कार करवा देते हैं। हमारे संत महापुरुष कहते हैं कि श्री हरि जी सब जगह हैं, लेकिन नजर नहीं आते। इसका कारण यह है कि हम जिस तरह उसे खोजना चाहते हैं वह प्रभु इस तरह नहीं मिलता। जिस तरह पानी सर्वत्र है उसे हर जगह से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, उसे प्राप्त करने के लिए किसी नल, नदी आदि का होना जरूरी है। ऐसे ही वह ईश्वर भी सब जगह है, लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए जरूरत है अपने घट के भीतर में जाने वाले मार्ग को खोज कर उसे प्राप्त करने की।
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हमारे धार्मिक ग्रंथ कहते है कि जैसे तिल में तेल, फूल में सुगंधी है, माखन में घी है ठीक ऐसे ही ईश्वर हमारे घट के भीतर है। वह किसी संत की कृपा से हमारे भीतर प्रगट होता है। इसलिए प्रभु प्राप्ती के लिए हमें पूर्ण गुरु की परम आवश्यकता है। प्रथम दिवस कथा को विराम प्रभु की पावन आरती द्वारा दिया गया। प्रभु की पावन आरती में श्री सनातन धर्म मंदिर सभा, महिला संकीर्तन मंडल एवं जागरण मंडल सेक्टर-10 पंचकूला के सभी सदस्य उपस्थित रहे।
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