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Panchkula News: पंचकूला निगम में कुर्सी की जंग तेज, सीनियर-डिप्टी मेयर पर हाईकमान करेगा फैसला
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तीन गुटों में बंटी भाजपा, महिला आरक्षण और जातीय समीकरण ने बढ़ाई पेचिदगी
संगठन के दावों के बीच त्रिकोणीय चक्रव्यूह में फंसे पार्षद
दीपक शाही
पंचकूला। नगर निगम चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पंचकूला में अपनी ताकत का लोहा तो मनवा लिया है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। विकास के दावों और वादों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या इस बार सीनियर और डिप्टी मेयर का चुनाव समय पर हो पाएगा? या फिर इस बार भी यह मामला आपसी खींचतान और अपनों को कुर्सी पर बैठाने की सियासत की भेंट चढ़ जाएगा?
याद रहे, पिछले पांच साल के कार्यकाल में पंचकूला नगर निगम को सीनियर और डिप्टी मेयर नसीब ही नहीं हो पाए थे। इस बार भले ही विपक्ष (कांग्रेस) के पास महज एक पार्षद (वार्ड 18) होने के कारण वह बैकफुट पर हो, लेकिन भाजपा के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय बना दिया है।
तीन गुटों में बंटे पार्षद, साख की लड़ाई बनी कुर्सी
सियासी गलियारों में चर्चा आम है कि संगठन भले ही सार्वजनिक रूप से चुनाव कराने की बात कह रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा के नवनिर्वाचित पार्षद तीन मजबूत धड़ों में बंटे नजर आ रहे हैं। पहला गुट पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता के करीबियों का है, जो निगम में अपना पुराना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। वहीं दूसरा गुट नव-निर्वाचित मेयर से लेकर कई पार्षद राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा को अपना सिपहसालार मानकर चल रहे हैं। इसके अलावा तीसरा गुट मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार तरुण भंडारी का है, जो पर्दे के पीछे से अपनी बिसात बिछा रहे हैं।
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ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार भी फैसले के लिए चंडीगढ़ (मुख्यमंत्री कार्यालय) से दखलअंदाजी की नौबत आएगी या स्थानीय स्तर पर ही सहमति बन पाएगी।
जातीय समीकरण और महिला आरक्षण का कॉम्बिनेशन
सीनियर और डिप्टी मेयर की कुर्सियों के लिए इस बार जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। मेयर पद पर बनिया समुदाय से श्याम लाल बंसल की ताजपोशी हो चुकी है। अब पंजाबी समुदाय, जिसका शहर में बड़ा वोट बैंक है, अपनी दावेदारी मजबूत कर रहा है। वहीं 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की पैरोकारी के बीच संगठन पर यह भी दबाव है कि सीनियर या डिप्टी मेयर में से कम से कम एक पद महिला पार्षद की झोली में डाला जाए।
कोर्ट के आदेश भी हवा में, पांच साल तक ठेंगे पर रहा लोकतंत्र
पंचकूला निगम का इतिहास इस मामले में बेहद चौंकाने वाला रहा है। पांच जनवरी 2021 को तत्कालीन मेयर कुलभूषण गोयल ने शपथ ली थी, लेकिन पूरे पांच साल सीनियर और डिप्टी मेयर की सीटें खाली रहीं। यह हरियाणा के इतिहास का सबसे अनोखा और हैरान करने वाला मामला है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार को हर हाल में चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। हरियाणा सरकार ने कोर्ट में लिखित आश्वासन दिया था कि सितंबर 2024 तक चुनाव करा लिए जाएंगे, जिसके बाद कोर्ट ने 24 जुलाई 2024 को याचिका का निपटारा कर दिया। इसके बावजूद न तो सितंबर में चुनाव हुए और न ही नवंबर की संशोधित तारीख पर। नवंबर में ऐन वक्त पर रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) सहायक आयुक्त के अचानक अस्वस्थ होने का कारण बताकर चुनाव टाल दिया गया, जिसे लेकर तत्कालीन विपक्ष ने सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए थे।
नियमावली का हवाला, संविधान की अनदेखी
एडवोकेट विजय बंसल ने बताया कि कानूनन चुनाव की अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के भीतर इन पदों को भरा जाना अनिवार्य होता है। लेकिन अधिकारियों और राजनेताओं की जुगलबंदी के कारण यह 60 दिन की समय-सीमा सिर्फ नियमों की किताबों तक सीमित रह गई। जानकारों का मानना है कि यह निष्क्रियता न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 243, 243 एस और नगर निगम अधिनियम 1994 का भी खुला उल्लंघन है।
कोट
अगले सोमवार और मंगलवार तक नगर निगम के चुने गए मेयर सहित पार्षदों का शपथ ग्रहण होने की संभावना है। उसके बाद सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर चुनाव पर फैसला होगा। यह चयन हाईकमान की ओर से किया जाएगा। मेरी राय मांगी जाएगी तो मैं अवश्य दूंगा।
- श्याम लाल बंसल, नव-निर्वाचित पंचकूला मेयर
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संगठन के दावों के बीच त्रिकोणीय चक्रव्यूह में फंसे पार्षद
दीपक शाही
पंचकूला। नगर निगम चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पंचकूला में अपनी ताकत का लोहा तो मनवा लिया है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। विकास के दावों और वादों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या इस बार सीनियर और डिप्टी मेयर का चुनाव समय पर हो पाएगा? या फिर इस बार भी यह मामला आपसी खींचतान और अपनों को कुर्सी पर बैठाने की सियासत की भेंट चढ़ जाएगा?
याद रहे, पिछले पांच साल के कार्यकाल में पंचकूला नगर निगम को सीनियर और डिप्टी मेयर नसीब ही नहीं हो पाए थे। इस बार भले ही विपक्ष (कांग्रेस) के पास महज एक पार्षद (वार्ड 18) होने के कारण वह बैकफुट पर हो, लेकिन भाजपा के भीतर की अंदरूनी गुटबाजी ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय बना दिया है।
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तीन गुटों में बंटे पार्षद, साख की लड़ाई बनी कुर्सी
सियासी गलियारों में चर्चा आम है कि संगठन भले ही सार्वजनिक रूप से चुनाव कराने की बात कह रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा के नवनिर्वाचित पार्षद तीन मजबूत धड़ों में बंटे नजर आ रहे हैं। पहला गुट पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता के करीबियों का है, जो निगम में अपना पुराना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। वहीं दूसरा गुट नव-निर्वाचित मेयर से लेकर कई पार्षद राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा को अपना सिपहसालार मानकर चल रहे हैं। इसके अलावा तीसरा गुट मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार तरुण भंडारी का है, जो पर्दे के पीछे से अपनी बिसात बिछा रहे हैं।
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जातीय समीकरण और महिला आरक्षण का कॉम्बिनेशन
सीनियर और डिप्टी मेयर की कुर्सियों के लिए इस बार जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। मेयर पद पर बनिया समुदाय से श्याम लाल बंसल की ताजपोशी हो चुकी है। अब पंजाबी समुदाय, जिसका शहर में बड़ा वोट बैंक है, अपनी दावेदारी मजबूत कर रहा है। वहीं 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की पैरोकारी के बीच संगठन पर यह भी दबाव है कि सीनियर या डिप्टी मेयर में से कम से कम एक पद महिला पार्षद की झोली में डाला जाए।
कोर्ट के आदेश भी हवा में, पांच साल तक ठेंगे पर रहा लोकतंत्र
पंचकूला निगम का इतिहास इस मामले में बेहद चौंकाने वाला रहा है। पांच जनवरी 2021 को तत्कालीन मेयर कुलभूषण गोयल ने शपथ ली थी, लेकिन पूरे पांच साल सीनियर और डिप्टी मेयर की सीटें खाली रहीं। यह हरियाणा के इतिहास का सबसे अनोखा और हैरान करने वाला मामला है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकार को हर हाल में चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। हरियाणा सरकार ने कोर्ट में लिखित आश्वासन दिया था कि सितंबर 2024 तक चुनाव करा लिए जाएंगे, जिसके बाद कोर्ट ने 24 जुलाई 2024 को याचिका का निपटारा कर दिया। इसके बावजूद न तो सितंबर में चुनाव हुए और न ही नवंबर की संशोधित तारीख पर। नवंबर में ऐन वक्त पर रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) सहायक आयुक्त के अचानक अस्वस्थ होने का कारण बताकर चुनाव टाल दिया गया, जिसे लेकर तत्कालीन विपक्ष ने सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए थे।
नियमावली का हवाला, संविधान की अनदेखी
एडवोकेट विजय बंसल ने बताया कि कानूनन चुनाव की अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के भीतर इन पदों को भरा जाना अनिवार्य होता है। लेकिन अधिकारियों और राजनेताओं की जुगलबंदी के कारण यह 60 दिन की समय-सीमा सिर्फ नियमों की किताबों तक सीमित रह गई। जानकारों का मानना है कि यह निष्क्रियता न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 243, 243 एस और नगर निगम अधिनियम 1994 का भी खुला उल्लंघन है।
कोट
अगले सोमवार और मंगलवार तक नगर निगम के चुने गए मेयर सहित पार्षदों का शपथ ग्रहण होने की संभावना है। उसके बाद सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर चुनाव पर फैसला होगा। यह चयन हाईकमान की ओर से किया जाएगा। मेरी राय मांगी जाएगी तो मैं अवश्य दूंगा।
- श्याम लाल बंसल, नव-निर्वाचित पंचकूला मेयर