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जब मुझे मेरी मां समझ नहीं पाई तो दुनिया कैसे समझेगी
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‘जब मुझे मेरी मां नहीं समझ पाईं तो दुनिया क्या समझती’
सबहेड
पीजीआई में एलजीबीटीआई की आयोजित संगोष्ठी में पहुंचे सिमरनजीत कौर से सिमरनजीत बने युवक ने अपना दर्द किया साझा
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पीजीआई में शनिवार को लेस्बियन, गे, बाय सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर व इंटर सेक्स (एलजीबीटीआई) पर दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान जेंडर चेंज कराकर सिमरनजीत कौर से सिमरनजीत उर्फ सैम (33) बन चुके युवक ने अपनी दर्द भरी दास्तां साझा की। सैम ने बताया कि छह साल की उम्र में उन्हें इस बात का अहसास होने लगा था कि वह ऊपर से तो कुछ और हैं लेकिन अंदर से वैसे नहीं हैं। उम्र बढ़ने के साथ उन्हें अपनी बात पर यकीन होने लगा। वह जब भी इस बात को अपनी मां को बताते थे तो वह उन पर गुस्सा होने लगती थीं। इसके बाद उन्हें तरह-तरह के ताने मिलने लगे और कहा जाने लगा कि तुम एक लड़की हो और कुछ भी ऐसा मत करना, जिससे पूरे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाए। लड़कों जैसे कपड़े पहनने और दिखने की जिद में वह जब एक बार अपनी चोटी कटवाकर टॉम ब्वाय के लुक में पहुंचे तो घर में उन्हें खूब पीटा गया और कहा गया कि वह घर से न निकलें।
उन्होंने काफी कोशिश की कि उनके पैरेंट्स समझ जाएं कि वह फीमेल नहीं बल्कि मेल हैं, लेकिन वह नहीं माने। होशियारपुर के रहने वाले सिमरनजीत साल 2008 में लंदन चले गए। उन्होंने वहां पर आगे की पढ़ाई की और इस दौरान सेक्स चेंज कराने के बारे में छानबीन शुरू की, लेकिन पता चला कि वहां पर चार से पांच साल की वेंटिंग हैं। उसके बाद वे साल 2013 में वापस भारत लौटे और यहां सर्जरी के लिए संस्थान और डाक्टर की खोजबीन शुरू की। करीब दो साल बाद नई दिल्ली में एक प्राइवेट संस्थान में सेक्स चेंज करवाया। उनका कहना है कि सेक्स चेंज कराने के बाद उन्होंने जो खुशी महसूस की, वो शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं मिलती। सैम ने कहा कि उनके जैसे लोगों की जिंदगी बहुत कठिन होती है। जब हमारी फीलिंग मां नहीं समझ सकती तो समाज के लोग कैसे समझेंगे।
यदि बचपन में पैरेंट्स फीलिंग समझ लेते थे तो शायद वह फौज या सिविल सर्विस में अफसर होते। उन्होंने अपने साथ हो रहे भेदभाव के बारे में भी बताया। उनका कहना था कि जब वे एक बैंक में जॉब कर रहे थे तो उनके बॉस उनके पहनावे और लुक पर आपत्ति जताते थे। एसाइनमेंट पर नहीं भेजते थे। कंपनी को लगता था कि मेरे फील्ड में जाने से कंपनी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। चौथे-पांचवें महीने मुझे नौकरी छोड़नी पड़ती थी। सैम ने बताया कि सर्जरी कराने के बाद उन्होंने अपनी लाइफ पाटर्नर भी ढूंढ ली है। वह तमन्ना नाम की महिला के साथ रह रहे हैं। तमन्ना की एक बेटी हैं, जिसे सैम ने अपना लिया है। सैम का कहना है कि परिवार के किसी बच्चे में अलग फीलिंग है तो दस साल की उम्र तक उसके मन को डायवर्ट किया जा सकता है। मेरे पैरेंट्स ऐसा करते तो शायद मैं कुछ और होता।
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डाक्टर हूं, कभी पेशेंट छूते हैं तो कभी उनके परिजन छेड़खानी करते
पुडुचेरी के एक हास्पिटल में कार्यरत एनेस्थीसिया की डाक्टर समीरा कभी समीर के नाम से जानी जाती थीं। आठ साल में उन्हें महसूस हो गया था कि उनका शरीर और आत्मा दोनों अलग हैं। वह कहती हैं कि समीर से समीरा बनने का सफर उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके जैसे लोगों के साथ काफी शोषण होता है। आज भी उनके साथ कभी पेशेंट छेड़छाड़ करते हैं तो कभी मरीजों के साथ आए परिजन गलत जगह पर छूते हैं। अस्पताल के बाहर निकलते लोग कमेंट करते हैं। जब उनसे पूछा गया कि वह डाक्टर कैसे बनीं? तो उन्होंने कहा कि इतना सब कुछ होने के बावजूद उनका फोकस पढ़ाई पर रहा। वह अब मेडिकल लिटरेचर में जेंडर आइडेंटीटी की कमियों पर काम कर रही हैं। कई जगह इसे बीमारी बताई गई है। अब इसे दूर करना है।
इस तरह के आयोजन होना अच्छी पहल
इस मौके पर हमसफर ट्रस्ट के चेयरमैन अशोक रो कवि ने बताया कि पीजीआई जैसे संस्थान में एलजीबीटीआई जैसे विषयों पर खुलकर बात हो रही है तो यह एक अच्छी पहल है। यहां पर उनके कई सारे मुद्दों पर खुलकर बातचीत हो रही है। जो भी यहां पर विचार, डिमांड या मुद्दे निकलेंगे, उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और सोशल जस्टिस मंत्रालय को भेजा जाएगा।
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‘जब मुझे मेरी मां नहीं समझ पाईं तो दुनिया क्या समझती’
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पीजीआई में एलजीबीटीआई की आयोजित संगोष्ठी में पहुंचे सिमरनजीत कौर से सिमरनजीत बने युवक ने अपना दर्द किया साझा
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पीजीआई में शनिवार को लेस्बियन, गे, बाय सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर व इंटर सेक्स (एलजीबीटीआई) पर दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान जेंडर चेंज कराकर सिमरनजीत कौर से सिमरनजीत उर्फ सैम (33) बन चुके युवक ने अपनी दर्द भरी दास्तां साझा की। सैम ने बताया कि छह साल की उम्र में उन्हें इस बात का अहसास होने लगा था कि वह ऊपर से तो कुछ और हैं लेकिन अंदर से वैसे नहीं हैं। उम्र बढ़ने के साथ उन्हें अपनी बात पर यकीन होने लगा। वह जब भी इस बात को अपनी मां को बताते थे तो वह उन पर गुस्सा होने लगती थीं। इसके बाद उन्हें तरह-तरह के ताने मिलने लगे और कहा जाने लगा कि तुम एक लड़की हो और कुछ भी ऐसा मत करना, जिससे पूरे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाए। लड़कों जैसे कपड़े पहनने और दिखने की जिद में वह जब एक बार अपनी चोटी कटवाकर टॉम ब्वाय के लुक में पहुंचे तो घर में उन्हें खूब पीटा गया और कहा गया कि वह घर से न निकलें।
उन्होंने काफी कोशिश की कि उनके पैरेंट्स समझ जाएं कि वह फीमेल नहीं बल्कि मेल हैं, लेकिन वह नहीं माने। होशियारपुर के रहने वाले सिमरनजीत साल 2008 में लंदन चले गए। उन्होंने वहां पर आगे की पढ़ाई की और इस दौरान सेक्स चेंज कराने के बारे में छानबीन शुरू की, लेकिन पता चला कि वहां पर चार से पांच साल की वेंटिंग हैं। उसके बाद वे साल 2013 में वापस भारत लौटे और यहां सर्जरी के लिए संस्थान और डाक्टर की खोजबीन शुरू की। करीब दो साल बाद नई दिल्ली में एक प्राइवेट संस्थान में सेक्स चेंज करवाया। उनका कहना है कि सेक्स चेंज कराने के बाद उन्होंने जो खुशी महसूस की, वो शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं मिलती। सैम ने कहा कि उनके जैसे लोगों की जिंदगी बहुत कठिन होती है। जब हमारी फीलिंग मां नहीं समझ सकती तो समाज के लोग कैसे समझेंगे।
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डाक्टर हूं, कभी पेशेंट छूते हैं तो कभी उनके परिजन छेड़खानी करते
पुडुचेरी के एक हास्पिटल में कार्यरत एनेस्थीसिया की डाक्टर समीरा कभी समीर के नाम से जानी जाती थीं। आठ साल में उन्हें महसूस हो गया था कि उनका शरीर और आत्मा दोनों अलग हैं। वह कहती हैं कि समीर से समीरा बनने का सफर उनके लिए आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके जैसे लोगों के साथ काफी शोषण होता है। आज भी उनके साथ कभी पेशेंट छेड़छाड़ करते हैं तो कभी मरीजों के साथ आए परिजन गलत जगह पर छूते हैं। अस्पताल के बाहर निकलते लोग कमेंट करते हैं। जब उनसे पूछा गया कि वह डाक्टर कैसे बनीं? तो उन्होंने कहा कि इतना सब कुछ होने के बावजूद उनका फोकस पढ़ाई पर रहा। वह अब मेडिकल लिटरेचर में जेंडर आइडेंटीटी की कमियों पर काम कर रही हैं। कई जगह इसे बीमारी बताई गई है। अब इसे दूर करना है।
इस तरह के आयोजन होना अच्छी पहल
इस मौके पर हमसफर ट्रस्ट के चेयरमैन अशोक रो कवि ने बताया कि पीजीआई जैसे संस्थान में एलजीबीटीआई जैसे विषयों पर खुलकर बात हो रही है तो यह एक अच्छी पहल है। यहां पर उनके कई सारे मुद्दों पर खुलकर बातचीत हो रही है। जो भी यहां पर विचार, डिमांड या मुद्दे निकलेंगे, उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और सोशल जस्टिस मंत्रालय को भेजा जाएगा।