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ना बैंक पैसा दे रहे हैं, ना एटीएम

Thu, 08 Dec 2016 04:45 PM IST
palwal
palwal Updated Thu, 08 Dec 2016 04:45 PM IST
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cashless bank and atm
कैश की चाह में लोग लकीर के फकीर बन गए हैं। सरकारी फरमान के बाद 1000-500 के नोटों को बंद हुए एक महीना बीत गया है। अपना पैसा पाने के लिए लोग सुबह से शाम तक बैंकों के बाहर खड़े रहते हैं। लेकिन जब तक उनका नंबर आता है, बैंक कैश खत्म होने की बात कह कर बैरंग लौटा देते हैं।
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सरकारी दावा है कि देशभर के 80 फीसदी एटीएम कैश दे रहे हैं, लेकिन धरातल पर हालात अलग है। एनसीआर के शहरी क्षेत्रों तक में लोग एटीएम दर एटीएम भटकते दिखते हैं। शहरों की यह हाल है, तो ग्रामीण क्षेत्र में तो लोग पैसे-पैसे को मोहताज हो गए हैं। आलम यह है कि कई स्थानों पर तो लोग एक-दूसरे से सामान के बदले सामान लेकर काम चला रहे हैं। 
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यूं तो पलवल जिला सारा ही ग्रामीण बाहुल्य जिला माना जाता है। लेकिन इसमें  हसनपुर व हथीन तो पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश में शामिल हैं। दोनों कस्बों के लोग कैश के लिए दिन-रात एक किए हैं। जिसके चलते खेती व कारोबार भी प्रभावित हो रहा है, लेकिन पैसा है कि लोग पाने का जितना प्रयास करते, उतना ही दूर जाता दिखता है। 
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हसनपुर कस्बे में केनरा बैंक, ओबीसी व एचडीएफसी तीन बैंकों की शाखाएं हैं। चार बैंकों ने यहां एटीएम लगाए है। लेकिन एटीएम तो नोटबंदी के बाद से एक दिन भी किसी को पैसा नहीं दे पाए। सभी एटीएम बूथों पर नोटबंदी के बाद से ताला लटका हुआ है। बैंकों में भी सुबह सवेरे लोग उठकर कतार में लग जाते हैं, लेकिन पैसे की चाह पूरी नहीं होती। कस्बे के रामपाल, सुरेश, श्यामसुंदर व संजय के अनुसार बैंकों के बाहर लाईन में लगना व लौट जाना ही जैसे दिनचर्या बन गई है। 


इसी प्रकार हथीन में राष्ट्रीयकृत व निजी क्षेत्र के 11 बैंक व 13 एटीएम हैं। कस्बे व आसपास के गांवों को लोग सुबह पौ फटते बैंकों के बाहर पहुंचने शुरू हो जाते है, लेकिन दिन भर लाईन में लगने के बाबजूद भी पैसे की चाह पूरी नीं होती। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूर मोहम्मद मेवाती का कहना है कि कस्बे में लगे 13 एटीएम में से 12 तो पहले दिन से ही डिब्बे बने हुए हैं। केवल एसबीआई के एटीएम ने 11 नवंबर को जरूर 100 व 50 के नोट उगले थे, उसके बाद वह भी शांत हो गया। 

 
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