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Palwal News: रेतीली जमीन पर उगा मुनाफे का बाग

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 27 Oct 2026 12:09 AM IST
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An orchard of profit grown on sandy soil
सद्दाम हुसैन
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पिनगवां। मेवात में किसान अब गेहूं, सरसों और बाजरे जैसी परंपरागत फसलों के साथ फलों की बागवानी की ओर भी रुख कर रहे हैं। खानपुर घाटी गांव में रेतीली मिट्टी पर लहलहा रहे मौसमी और नींबू के बाग इस बदलाव की मिसाल हैं। यहां मौसमी का फल 40 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। खरीदार सीधे बाग में पहुंचकर फल खरीद रहे हैं, जिससे किसानों को मंडी तक फसल ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती और अच्छी आमदनी हो रही है।
गांव के किसान फजल हुसैन ने एक एकड़ से अधिक जमीन पर मौसमी का बाग लगाया हुआ है, जबकि किसान रहीमुद्दीन आधे एकड़ में मौसमी की खेती कर रहे हैं। फजल हुसैन ने बताया कि करीब चार साल पहले वह श्रीगंगानगर से मौसमी के पौधे लेकर आए थे। लगभग डेढ़ साल में पौधों पर फल आने लगे। पिछले तीन वर्षों से उन्हें अच्छी गुणवत्ता की मौसमी मिल रही है। इससे वह सालाना एक लाख रुपये से अधिक की आमदनी कर रहे हैं। फजल हुसैन के अनुसार, मौसमी के बाग में पौधों के बीच खाली जगह का इस्तेमाल फूलों और खीरे जैसी सब्जियों की खेती के लिए भी किया जा सकता है। इससे किसान एक ही जमीन से दो तरह की फसल लेकर अतिरिक्त आमदनी कमा सकते हैं। उन्होंने बताया कि क्षेत्र की रेतीली मिट्टी और मीठा पानी मौसमी की बागवानी के लिए अनुकूल हैं।
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जिला बागवानी अधिकारी डॉ. अब्दुल रज्जाक ने बताया कि जिले में इस साल करीब 25 हेक्टेयर क्षेत्र में आम, नींबू, अमरूद और मौसमी सहित विभिन्न फलों की बागवानी की जा रही है।
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कोट
चार साल पहले श्रीगंगानगर से पौधे लाकर लगाए थे। तीन वर्षों से अच्छी गुणवत्ता के फल मिल रहे हैं। एक एकड़ से सालाना एक लाख रुपये से अधिक की कमाई हो रही है। - फजल हुसैन
फलों की बागवानी किसानों के लिए अच्छा विकल्प है। मैंने आधे एकड़ में मौसमी का बाग लगाया है। इससे आमदनी बढ़ने की उम्मीद है। क्षेत्र की मिट्टी और पानी इसके अनुकूल हैं। - रहीमुद्दीन

वर्जन
जिले में किसानों को फलों की बागवानी के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग की ओर से 42 हजार रुपये प्रति एकड़ अनुदान दिया जाता है। किसान जरूरी दस्तावेज के साथ मेरी फसल मेरा ब्योरा पोर्टल पर पंजीकरण कराकर इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। पौधे भारत सरकार से मान्यता प्राप्त नर्सरी से खरीदे होने चाहिए। - डॉ. अब्दुल रज्जाक, जिला बागवानी अधिकारी
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