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परेशानी का सबब बना सरकारी इलाज

Sun, 08 Dec 2013 08:27 PM IST
अमर उजाला गुड़गांव
अमर उजाला गुड़गांव Updated Sun, 08 Dec 2013 08:27 PM IST
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Official treatment led to trouble

सिविल अस्पताल में पर्ची कटवाने से लेकर डॉक्टर को दिखाने और टेस्ट कराने से लेकर दवा लेने तक के लिए महिलाओं को खासी परेशानी आती है। अलग लाइन नहीं होने के कारण महिला मरीजों को धक्का-मुक्की का भी सामना करना पड़ता है। सिविल अस्पताल में रजिस्ट्रेशन काउंटर से ही परेशानी का दौर शुरू हो जाता है। रजिस्ट्रेशन काउंटर पर महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग खिड़की है, लेकिन किसी महिला को अगर अपने पुरुष परिजन का कार्ड बनवाना हो तो उसे पुरुषों वाली लाइन में लगने को कहा जाता है। ऐसा इसलिए ताकि रजिस्ट्रेशन काउंटर पर बैठे कर्मचारियों को अलग-अलग रजिस्टर बनाने की जहमत न उठानी पड़े। सबसे ज्यादा परेशानी तो पुराने मरीजों की है। उनके लिए केवल एक ही काउंटर बना है। चाहे महिला हो, पुरुष हो या फिर कोई सीनियर सिटीजन। सभी के लिए इसी एक काउंटर से पुरानी पर्ची का नवीनीकरण होता है। भीड़ अधिक होने की वजह से पर्ची बनवाना ही जंग जीतने के समान हो जाता है।

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डॉक्टर को दिखाने के लिए भी एक ही लाइन
सिविल अस्पताल में एक भी विभाग ऐसा नहीं है, जहां महिला और पुरुष मरीजों की अलग-अलग लाइन की व्यवस्था की गई हो। डॉक्टर को दिखाने के लिए भी मरीजों की एक ही लाइन लगती है। पर्ची जमा कराने के लिए होड़ मचती है और अक्सर महिलाएं सबसे पीछे रह जाती हैं। यहां चिकित्सकों की संख्या भी कम है। इस कारण मरीजों को इलाज के लिए कई घंटे तक इंतजार करना पड़ता है।
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टेस्ट भी नहीं आसान
सिविल अस्पताल में महिलाओं को अल्ट्रासाउंड के लिए चार से पांच दिन की वेटिंग दी जा रही है, वहीं एमआरआई के लिए डेढ़ से दो सप्ताह की वेटिंग चल रही है। यहां केवल गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड हो रहा है। सामान्य मरीजों को बाहर की निजी लैब से अल्ट्रासाउंड कराकर लाना पड़ता है।
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व्यवस्थाएं इस तरह से बनाई गई हैं, जिससे किसी भी मरीज को परेशानी न आए। जहां तक महिला मरीजों को भीड़ की वजह से परेशानी आने की बात है तो इस दिशा में व्यवस्थाएं और बेहतर की जाएंगी।
-डॉ. मनीष राठी, वरिष्ठ प्रबंधन अधिकारी, सिविल अस्पताल, गुड़गांव

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