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गेहूं बीज खरीद घोटाला : नैफेड और हरियाणा सरकार आमने-सामने
अमर उजाला चंडीगढ़
Updated Sun, 01 Dec 2013 12:58 PM IST
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हरियाणा बीज विकास निगम ने नवंबर, 2010 में एक लाख क्विंटल गेहूं बीज एनसीसीएफ और नैफेड के जरिए खरीदा था।
इसमें से 10000 क्विंटल बीज नैफेड ने निगम को बेचा था जबकि शेष एनसीसीएफ ने।
सीनियर आईएएस डॉ. अशोक खेमका ने इस बीज खरीद में पांच करोड़ रुपये की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के पांच करोड़ रुपये की सब्सिडी के घपले की शिकायत सीबीआई से कर रखी है।
खेमका के आरोपों पर नैफेड ने जांच की। जांच में नैफेड के एक मैनेजर और बीज विकास निगम के अफसरों की मिलीभगत बताई।
हरियाणा सरकार ने इस जांच रिपोर्ट को गलत करार दिया और सरकार की तरफ से आपत्ति दर्ज कराई।
ये है नैफेड की जांच रिपोर्ट
नैफेड ने अपने मैनेजर एनके शर्मा से मामले की जांच कराई। शर्मा ने जांच रिपोर्ट में लिखा, ‘10 हजार क्विंटल बीज नैफेड के लुधियाना ब्रांच ने बीज निगम को सप्लाई किया था।
मैंने कुछ बीज सप्लायरों से रेट की जानकारी एकत्र की और अशोक खेमका ने जो पत्र उप निदेशक का नत्थी किया था, उसमें लिखे रेट भी अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय ध्यान में रखे।
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जब निगम ने बीज सप्लाई करने की जानकारी मांगी थी तब लुधियाना ब्रांच मैनेजर आरपी शर्मा 31 अक्तूबर से 4 नवंबर, 2010 तक दिल्ली में थे।
मगर ब्रांच मैनेजर ने यूनाइटेड एग्री सीड कारपोरेशन से संपर्क साधा जबकि यह कारपोरेशन नैफेड के पैनल पर नहीं थी। इस एजेंसी से रेट लेने के बाद शर्मा ने वही रेट निगम को भेज दिए।
यह आश्चर्यजनक है कि शर्मा ने किसी अन्य सप्लायर से रेट की जानकारी नहीं ली और न ही मार्केट रेट की पड़ताल की। अगर वे ऐसा करते तो मार्केट रेट की वास्तविक स्थिति का पता चल जाता।
शर्मा का यह आचरण संदेह पैदा करता है। शर्मा का जवाब भी स्पष्ट नहीं था। गेहूं बीज का मार्केट रेट उस समय 1650 से 1800 रुपये प्रति क्विंटल था।
जबकि लुधियाना ब्रांच ने यह बीज 2050 रुपये प्रति क्विंटल की दर से सप्लाई किया।
यह 400 रुपये प्रति क्विंटल ज्यादा था। इसलिए बीज निगम के प्रबंध निदेशक (अशोक खेमका) का यह आरोप सत्य है कि नैफेड, एनसीसीएफ और बीज निगम के अफसरों, कर्मचारियों ने मिलीभगत कर बीज मार्केट रेट से काफी ऊंची दर पर सप्लाई किया और इस तरह से अर्जित किया अतिरिक्त धन से सप्लायरों को समृद्ध किया।
जिन चार पार्टियों मुक्त सीड सिरसा, मोती एग्रो सफीदों, कुबेर सीड फतेहाबाद और नामधारी फूड इंटरनेशनल जीवन नगर के जरिए यह बीज खरीदा था।
इसलिए प्रबंध निदेशक का यह आरोप भी सच लगता है कि लुधियाना ब्रांच ने मिडलमैन का काम किया।
इसके अलावा प्रबंध निदेशक का यह आरोप भी सच लगता है कि नैफेड, बीज प्रमाणीकरण एजेंसी और बीज निगम के अधिकारी, कर्मचारी इस घोटाले में शामिल थे क्योंकि प्राइवेट सीड कंपनियों ने जो बीज सप्लाई किया था उसे प्रमाणीकृत करवाया गया।
यह भी सामने आया कि लुधियाना ब्रांच ने बीज निगम को जो बीज सप्लाई किया था, उसे 22 फरवरी, 2011 को नैफेड मुख्यालय ने रेगुलर करार दिया था।’
नैफेड की जांच रिपोर्ट गलत : हरियाणा सरकार
नैफेड ने अपनी जांच रिपोर्ट हरियाणा के कृषि विभाग के प्रधान सचिव रोशन लाल सैनी को भेजी थी।
सैनी ने इस जांच रिपोर्ट को गलत करार देते हुए नैफेड के एमडी से कहा कि बीज निगम और बीज प्रमाणीकरण एजेंसी से संपर्क किए बगैर एक जूनियर अफसर को जांच अधिकारी बनाकर कैसे टिप्पणियां करवा डाली।
सैनी ने एमडी को लिखे पत्र में जांच पर ऐसा सवाल उठाते हुए कहा, ‘जांच रिपोर्ट में टिप्पणियां अनुचित हैं।
प्रदेश सरकार इस पर अपना विरोध दर्ज करा रही है। जांच अधिकारी को प्रमाणीकरण और गैर प्रमाणीकरण के बारे में ज्ञान ही नहीं है।
नैफेड केंद्र सरकार की ऐसी अधिकृत एजेंसी है जो देश में राज्यों को बीज सप्लाई करती है।
राज्य सरकार नैफेड के मुख्यालय को जानती है न कि किसी ब्रांच को। नैफेड ने एक मार्च, 2013 को बीज निगम को भेजे पत्र में कहा था कि नवंबर , 2010 में सप्लाई किया गेहूं बीज पैनल सीड सप्लायर से लिया गया था।
नैफेड कभी टेंडर जारी नहीं करता है क्योंकि वह अपने पैनल सीड सप्लायरों से बीज लेता है।
नैफेड ने 3 नवंबर, 2010 को यह लिखकर दिया था कि उनके पास 10 हजार क्विंटल गेहूं बीज उपलब्ध है।
बीज सप्लाई करने के बदले नैफेड को छह लाख रुपये का कमीशन मिला था। यह देखना नैफेड का काम था कि सप्लायर सही है या नहीं।
जांच अधिकारी ने न मार्केट रेट जानने का प्रयास किया और न ही चारों सीड सप्लायरों से जानने का प्रयास किया।
बिना तथ्यों के जांच अधिकारी ने तत्कालीन एमडी (खेमका) के आरोपों की सिर्फ नकल कर ली।
नैफेड ने 22 मार्च, 2011 को जब अपनी लुधियाना ब्रांच के सप्लाई किए बीज को रेगुलर कर दिया तो ढाई साल बाद उससे हाथ धोने का मतलब क्या है?
जांच अधिकारी को जांच के मूल सिद्धांतों की जानकारी ही नहीं है। इतने जूनियर स्तर के अधिकारी से जांच अधिकारी की रिपोर्ट पर नैफेड मुख्यालय ने बिना दिमाग लगाए कैसे आंख मूंदकर भरोसा कर लिया?
प्रदेश सरकार ने शिकायत में लिखे आरोपों की जांच कराई थी। सरकार ने राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के बीज को बेचने का रेट 2150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था।
जांच अधिकारी की रिपोर्ट गलत है और इसे वापस लिया जाए। नैफेड अपने अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ जो मर्जी कार्रवाई करे, प्रदेश सरकार को उससे कोई लेना-देना नहीं है।
जो टिप्पणियां राज्य सरकार, बीज निगम और बीज प्रमाणीकरण एजेंसी के बारे में की गई हैं, उनके बारे में नैफेड के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार है।
रोशन लाल सैनी समेत अन्य अफसरों को हटाया जाए : खेमका
अशोक खेमका ने मुख्य सचिव पीके चौधरी को पत्र लिखकर मांग की है कि चूंकि सीबीआई जिन आरोपों की प्रारंभिक जांच कर रही है उनमें कृषि विभाग के प्रधान सचिव रोशन लाल सैनी पर भी आरोप हैं।
कुछ अन्य अफसरों पर भी आरोप हैं। जांच सही हो इसलिए सैनी समेत अन्य अफसरों को उनके मौजूदा पदों से हटाया जाए।
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इसमें से 10000 क्विंटल बीज नैफेड ने निगम को बेचा था जबकि शेष एनसीसीएफ ने।
सीनियर आईएएस डॉ. अशोक खेमका ने इस बीज खरीद में पांच करोड़ रुपये की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के पांच करोड़ रुपये की सब्सिडी के घपले की शिकायत सीबीआई से कर रखी है।
खेमका के आरोपों पर नैफेड ने जांच की। जांच में नैफेड के एक मैनेजर और बीज विकास निगम के अफसरों की मिलीभगत बताई।
हरियाणा सरकार ने इस जांच रिपोर्ट को गलत करार दिया और सरकार की तरफ से आपत्ति दर्ज कराई।
ये है नैफेड की जांच रिपोर्ट
नैफेड ने अपने मैनेजर एनके शर्मा से मामले की जांच कराई। शर्मा ने जांच रिपोर्ट में लिखा, ‘10 हजार क्विंटल बीज नैफेड के लुधियाना ब्रांच ने बीज निगम को सप्लाई किया था।
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मैंने कुछ बीज सप्लायरों से रेट की जानकारी एकत्र की और अशोक खेमका ने जो पत्र उप निदेशक का नत्थी किया था, उसमें लिखे रेट भी अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय ध्यान में रखे।
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जब निगम ने बीज सप्लाई करने की जानकारी मांगी थी तब लुधियाना ब्रांच मैनेजर आरपी शर्मा 31 अक्तूबर से 4 नवंबर, 2010 तक दिल्ली में थे।
मगर ब्रांच मैनेजर ने यूनाइटेड एग्री सीड कारपोरेशन से संपर्क साधा जबकि यह कारपोरेशन नैफेड के पैनल पर नहीं थी। इस एजेंसी से रेट लेने के बाद शर्मा ने वही रेट निगम को भेज दिए।
यह आश्चर्यजनक है कि शर्मा ने किसी अन्य सप्लायर से रेट की जानकारी नहीं ली और न ही मार्केट रेट की पड़ताल की। अगर वे ऐसा करते तो मार्केट रेट की वास्तविक स्थिति का पता चल जाता।
शर्मा का यह आचरण संदेह पैदा करता है। शर्मा का जवाब भी स्पष्ट नहीं था। गेहूं बीज का मार्केट रेट उस समय 1650 से 1800 रुपये प्रति क्विंटल था।
जबकि लुधियाना ब्रांच ने यह बीज 2050 रुपये प्रति क्विंटल की दर से सप्लाई किया।
यह 400 रुपये प्रति क्विंटल ज्यादा था। इसलिए बीज निगम के प्रबंध निदेशक (अशोक खेमका) का यह आरोप सत्य है कि नैफेड, एनसीसीएफ और बीज निगम के अफसरों, कर्मचारियों ने मिलीभगत कर बीज मार्केट रेट से काफी ऊंची दर पर सप्लाई किया और इस तरह से अर्जित किया अतिरिक्त धन से सप्लायरों को समृद्ध किया।
जिन चार पार्टियों मुक्त सीड सिरसा, मोती एग्रो सफीदों, कुबेर सीड फतेहाबाद और नामधारी फूड इंटरनेशनल जीवन नगर के जरिए यह बीज खरीदा था।
इसलिए प्रबंध निदेशक का यह आरोप भी सच लगता है कि लुधियाना ब्रांच ने मिडलमैन का काम किया।
इसके अलावा प्रबंध निदेशक का यह आरोप भी सच लगता है कि नैफेड, बीज प्रमाणीकरण एजेंसी और बीज निगम के अधिकारी, कर्मचारी इस घोटाले में शामिल थे क्योंकि प्राइवेट सीड कंपनियों ने जो बीज सप्लाई किया था उसे प्रमाणीकृत करवाया गया।
यह भी सामने आया कि लुधियाना ब्रांच ने बीज निगम को जो बीज सप्लाई किया था, उसे 22 फरवरी, 2011 को नैफेड मुख्यालय ने रेगुलर करार दिया था।’
नैफेड की जांच रिपोर्ट गलत : हरियाणा सरकार
नैफेड ने अपनी जांच रिपोर्ट हरियाणा के कृषि विभाग के प्रधान सचिव रोशन लाल सैनी को भेजी थी।
सैनी ने इस जांच रिपोर्ट को गलत करार देते हुए नैफेड के एमडी से कहा कि बीज निगम और बीज प्रमाणीकरण एजेंसी से संपर्क किए बगैर एक जूनियर अफसर को जांच अधिकारी बनाकर कैसे टिप्पणियां करवा डाली।
सैनी ने एमडी को लिखे पत्र में जांच पर ऐसा सवाल उठाते हुए कहा, ‘जांच रिपोर्ट में टिप्पणियां अनुचित हैं।
प्रदेश सरकार इस पर अपना विरोध दर्ज करा रही है। जांच अधिकारी को प्रमाणीकरण और गैर प्रमाणीकरण के बारे में ज्ञान ही नहीं है।
नैफेड केंद्र सरकार की ऐसी अधिकृत एजेंसी है जो देश में राज्यों को बीज सप्लाई करती है।
राज्य सरकार नैफेड के मुख्यालय को जानती है न कि किसी ब्रांच को। नैफेड ने एक मार्च, 2013 को बीज निगम को भेजे पत्र में कहा था कि नवंबर , 2010 में सप्लाई किया गेहूं बीज पैनल सीड सप्लायर से लिया गया था।
नैफेड कभी टेंडर जारी नहीं करता है क्योंकि वह अपने पैनल सीड सप्लायरों से बीज लेता है।
नैफेड ने 3 नवंबर, 2010 को यह लिखकर दिया था कि उनके पास 10 हजार क्विंटल गेहूं बीज उपलब्ध है।
बीज सप्लाई करने के बदले नैफेड को छह लाख रुपये का कमीशन मिला था। यह देखना नैफेड का काम था कि सप्लायर सही है या नहीं।
जांच अधिकारी ने न मार्केट रेट जानने का प्रयास किया और न ही चारों सीड सप्लायरों से जानने का प्रयास किया।
बिना तथ्यों के जांच अधिकारी ने तत्कालीन एमडी (खेमका) के आरोपों की सिर्फ नकल कर ली।
नैफेड ने 22 मार्च, 2011 को जब अपनी लुधियाना ब्रांच के सप्लाई किए बीज को रेगुलर कर दिया तो ढाई साल बाद उससे हाथ धोने का मतलब क्या है?
जांच अधिकारी को जांच के मूल सिद्धांतों की जानकारी ही नहीं है। इतने जूनियर स्तर के अधिकारी से जांच अधिकारी की रिपोर्ट पर नैफेड मुख्यालय ने बिना दिमाग लगाए कैसे आंख मूंदकर भरोसा कर लिया?
प्रदेश सरकार ने शिकायत में लिखे आरोपों की जांच कराई थी। सरकार ने राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के बीज को बेचने का रेट 2150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था।
जांच अधिकारी की रिपोर्ट गलत है और इसे वापस लिया जाए। नैफेड अपने अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ जो मर्जी कार्रवाई करे, प्रदेश सरकार को उससे कोई लेना-देना नहीं है।
जो टिप्पणियां राज्य सरकार, बीज निगम और बीज प्रमाणीकरण एजेंसी के बारे में की गई हैं, उनके बारे में नैफेड के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार है।
रोशन लाल सैनी समेत अन्य अफसरों को हटाया जाए : खेमका
अशोक खेमका ने मुख्य सचिव पीके चौधरी को पत्र लिखकर मांग की है कि चूंकि सीबीआई जिन आरोपों की प्रारंभिक जांच कर रही है उनमें कृषि विभाग के प्रधान सचिव रोशन लाल सैनी पर भी आरोप हैं।
कुछ अन्य अफसरों पर भी आरोप हैं। जांच सही हो इसलिए सैनी समेत अन्य अफसरों को उनके मौजूदा पदों से हटाया जाए।