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Mahendragarh-Narnaul News: पति की दीर्घायु के लिए महिलाओं ने चांद को अर्घ्य देकर खोला व्रत
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नारनौल। सदियों से अपने पति की दीर्घायु के लिए मनाए जाने वाला करवा चौथ का पर्व रविवार को शहर में महिलाओं द्वारा बड़ी आस्था एवं श्रद्धा भाव से मनाया गया। हिंदू धर्म में पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण का प्रतीक माने जाने वाले करवाचौथ का पर्व खास महत्व रखता है।
इसी के चलते सुहागिन स्त्रियों ने अपने पति की लंबी उम्र, सुख, समृद्धि और शांति के लिए यह व्रत रखा और प्रभु की आराधना की। महिलाएं दिन भर बिना कुछ खाए-पीए रहीं। महिलाओं ने करवा चौथ के व्रत को लेकर दोपहर में परिवार की सभी महिलाओं के साथ करवा चौथ की कहानी सुनी और चीनी व मिट्टी के करवे आदि रखकर भगवान का पूजन किया। रात सात बजे के बाद महिलाएं छत पर बैठकर चांद के निकले का इंतजार करती रही। इसके बाद रात साढ़े आठ बजे जैसे ही चांद निकला तो महिलाओं ने चांद के दर्शन करने के बाद अपने पति की पूजा कर व्रत को खोला। करवा चौथ के इस पर्व पर महिलाओं ने नए परिधान पहने और पूरी तरह सजीं नजर आईं। करवाचौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, करवा यानी मिट्टी का बर्तन और चौथ यानि चतुर्थी। इस त्योहार पर मिट्टी के बर्तन यानी करवे का विशेष महत्व माना जाता है, इसलिए महिलाओं ने मिट्टी व चीनी के करवे का भी पूजन किया। साल भर इस पर्व का इंतजार करने वाली सभी विवाहित स्त्रियों ने इसकी सभी विधियों को पूरा कर बड़े श्रद्धा-भाव से इसे मनाया।
बाक्स-
करवाचौथ के व्रत को लेकर आचार्य क्रांति निर्मल ने बताया कि भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ की कथा सुनाते हुए कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं। जीवन में सुख-सौभाग्य और धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्रीकृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना को पराजित कर विजय हासिल की। करवा चौथ के इस कठोर व्रत को करने वाली महिलाओं पर भगवान कृष्ण विशेष कृपा होती है।
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इसी के चलते सुहागिन स्त्रियों ने अपने पति की लंबी उम्र, सुख, समृद्धि और शांति के लिए यह व्रत रखा और प्रभु की आराधना की। महिलाएं दिन भर बिना कुछ खाए-पीए रहीं। महिलाओं ने करवा चौथ के व्रत को लेकर दोपहर में परिवार की सभी महिलाओं के साथ करवा चौथ की कहानी सुनी और चीनी व मिट्टी के करवे आदि रखकर भगवान का पूजन किया। रात सात बजे के बाद महिलाएं छत पर बैठकर चांद के निकले का इंतजार करती रही। इसके बाद रात साढ़े आठ बजे जैसे ही चांद निकला तो महिलाओं ने चांद के दर्शन करने के बाद अपने पति की पूजा कर व्रत को खोला। करवा चौथ के इस पर्व पर महिलाओं ने नए परिधान पहने और पूरी तरह सजीं नजर आईं। करवाचौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, करवा यानी मिट्टी का बर्तन और चौथ यानि चतुर्थी। इस त्योहार पर मिट्टी के बर्तन यानी करवे का विशेष महत्व माना जाता है, इसलिए महिलाओं ने मिट्टी व चीनी के करवे का भी पूजन किया। साल भर इस पर्व का इंतजार करने वाली सभी विवाहित स्त्रियों ने इसकी सभी विधियों को पूरा कर बड़े श्रद्धा-भाव से इसे मनाया।
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करवाचौथ के व्रत को लेकर आचार्य क्रांति निर्मल ने बताया कि भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ की कथा सुनाते हुए कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं। जीवन में सुख-सौभाग्य और धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्रीकृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना को पराजित कर विजय हासिल की। करवा चौथ के इस कठोर व्रत को करने वाली महिलाओं पर भगवान कृष्ण विशेष कृपा होती है।
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