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Mahendragarh-Narnaul News: एकादशी से चार माह तक नहीं बजेगी शहनाई
Thu, 03 Jul 2025 11:27 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Thu, 03 Jul 2025 11:27 PM IST
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फोटो संख्या:53- पंडित राहुल भारद्वाज--संवाद
महेंद्रगढ़। छह जुलाई को देवशयनी एकादशी से चार माह के मांगलिक कार्यक्रमों पर विराम लग जाएगा। आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी को देवशयनी कहा जाता है।
इस दिन से चातुर्मास आरंभ हो जाएगा। भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इस एकादशी को पद्मनाभा एकादशी और हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है और मोक्ष मिलता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल भारद्वाज ने बताया कि छह जुलाई देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू हो जाएगा। इन चार महीनों के दौरान श्रीहरि भगवान विष्णु चार महीनों के लिए बैकुंठ लोक छोड़कर राजा बलि के यहां पाताल लोक में निवास करते हैं। चार महीनों बाद कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी को भगवान योग निद्रा से जाग जाते है।
वापस माता लक्ष्मी के पास अपने लोक में वास करते हैं। उन्होंने बताया कि चातुर्मास के दौरान सभी मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। विवाह-शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि कार्य वर्जित माने गए है। हालांकि पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान और मंत्र जप कर सकते हैं। इसमें कोई मनाही नहीं है। यह अवधि तपस्या, साधना और पूजा-पाठ के लिए समर्पित होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि को दिए गए वरदान के चलते पाताल लोक में वास किया था। इसी कारण से यह अवधि उनके योग निद्रा के रूप में मनाई जाती है।
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इंसेट
भगवान शिव करते हैं सृष्टि का संचालन
शास्त्रों के अनुसार सृष्टि का संचालन का कार्य भगवान विष्णु के हाथ में रहता है, लेकिन जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, तब सृष्टि का संचालन का कार्यभार भगवान शिव करते हैं। चातुर्मास के दौरान भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इन चार महीने में ज्यादा से ज्यादा शंकर भगवान की आराधना करनी चाहिए। शिव पंचाक्षर ऊं नमः शिवाय, शिव पुराण, महामृत्युंजय मंत्रों का जाप करना चाहिए। इससे अक्षय फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही दोगुना पुण्य फल मिलता है।
इंसेट
चातुर्मास का वैज्ञानिक महत्व
चार महीनों में ऋतु परिवर्तन भी होता है। ऋतु परिवर्तन होने और कीटाणु एवं विषाणु बढ़ जाने से भी व्रत, उपवास, नियम और दान का महत्व बढ़ जाता है। क्योंकि इसी ऋतु में गंभीर रोग होने की संभावना रहती है। देवशयनी एकादशी के बाद चार महीने तक सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति का तेजस तत्व कम हो जाता है। यह चार सेहत सुधारकर आयु बढ़ाने के माह भी होते है। यदि आप किसी भी प्रकार के रोग से ग्रस्त हैं तो आपको इन चार माह में व्रत और चातुर्मास के नियमों का पालन करना चाहिए।
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इस दिन से चातुर्मास आरंभ हो जाएगा। भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इस एकादशी को पद्मनाभा एकादशी और हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है और मोक्ष मिलता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल भारद्वाज ने बताया कि छह जुलाई देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू हो जाएगा। इन चार महीनों के दौरान श्रीहरि भगवान विष्णु चार महीनों के लिए बैकुंठ लोक छोड़कर राजा बलि के यहां पाताल लोक में निवास करते हैं। चार महीनों बाद कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी को भगवान योग निद्रा से जाग जाते है।
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वापस माता लक्ष्मी के पास अपने लोक में वास करते हैं। उन्होंने बताया कि चातुर्मास के दौरान सभी मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। विवाह-शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि कार्य वर्जित माने गए है। हालांकि पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान और मंत्र जप कर सकते हैं। इसमें कोई मनाही नहीं है। यह अवधि तपस्या, साधना और पूजा-पाठ के लिए समर्पित होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि को दिए गए वरदान के चलते पाताल लोक में वास किया था। इसी कारण से यह अवधि उनके योग निद्रा के रूप में मनाई जाती है।
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भगवान शिव करते हैं सृष्टि का संचालन
शास्त्रों के अनुसार सृष्टि का संचालन का कार्य भगवान विष्णु के हाथ में रहता है, लेकिन जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, तब सृष्टि का संचालन का कार्यभार भगवान शिव करते हैं। चातुर्मास के दौरान भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इन चार महीने में ज्यादा से ज्यादा शंकर भगवान की आराधना करनी चाहिए। शिव पंचाक्षर ऊं नमः शिवाय, शिव पुराण, महामृत्युंजय मंत्रों का जाप करना चाहिए। इससे अक्षय फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही दोगुना पुण्य फल मिलता है।
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चातुर्मास का वैज्ञानिक महत्व
चार महीनों में ऋतु परिवर्तन भी होता है। ऋतु परिवर्तन होने और कीटाणु एवं विषाणु बढ़ जाने से भी व्रत, उपवास, नियम और दान का महत्व बढ़ जाता है। क्योंकि इसी ऋतु में गंभीर रोग होने की संभावना रहती है। देवशयनी एकादशी के बाद चार महीने तक सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति का तेजस तत्व कम हो जाता है। यह चार सेहत सुधारकर आयु बढ़ाने के माह भी होते है। यदि आप किसी भी प्रकार के रोग से ग्रस्त हैं तो आपको इन चार माह में व्रत और चातुर्मास के नियमों का पालन करना चाहिए।